अरुंधती और गिलानी में फर्क क्या ... ?
अरुंधती रॉय के एक बयान ने देश के लोगो को उस समय एक बड़ा झटका दिया जब उसने कश्मीर को देश का हिस्सा मानने से इनकार कर दिया उन्होंने कहा है कि कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा रहा ही नहीं है। अरुंधती रॉय को देश में एक बुद्धिजीवी के तौर पर देखा जाता है लेकिन उनके इस बयान ने कश्मीर की रक्षा में लगे नौजवानों को ज़रूर निराश किया है . अब हर भारत वासी के ज़ेहन में एक ही सवाल उठता है की गिलानी और अरुंधती में फर्क क्या है...
पहले जानते है कश्मीर को ....
चौंदहवी सदी में कश्मीर में इस्लाम के प्रवेश के बाद से लेकर आज तक कश्मीर हमेशा ही अपनी शांति के लिए जलता रहा है। सन १८४६ में कश्मीर में सिखों और अंग्रेजो के बीच संघर्ष हुआ. मुद्दा कश्मीर पर अंग्रेजों के अधिकार से जुड़ा था. बाद में अंग्रेजों ने ७५ लाख रुपये में राजा गुलाब सिंह को कश्मीर दे दिया. समय बीतता गया और सन १९२५ में गुलाब सिंह की ही पीढ़ी हरी सिंह को राजा बनाया गया. इसी समय एक बार फिर से गहती में मुस्लिम सियासत शुरू हुयी. १९४७ में राजा हरी सिंह और भारत सरकार के बीच कश्मीर के विलय को लेकर बातचीत चल ही रही थी कि पाकिस्तान के पख्तून काबिले के लोगों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया. हरी सिंह कश्मीर की रक्षा कर पाने में असहाय थे. भारत की सेना ने कश्मीर का वजूद बचाया. इसके साथ ही कश्मीर और भारत एक हो गए. १९७५ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और शेख अब्दुला के बीच हुए समझौते के बाद कश्मीर और भारत पूरी तरह से एक हो गए...
लेकिन फिर भी अरुंधती का ये बयान उनकी ओछी मानसिकता और लोकप्रियता हासिल करने की घटिया राजनीति को दर्शाती है । गिलानी और अरुंधती में फर्क सिर्फ इतना है की गिलानी पडोसी देश की खाता है और वहीं गाता है लेकिन अरुंधती अपने देश में रह के भी अपने देश की सच्चाई से वाकिफ नहीं है तो हम कह सकते है के गिलानी अरुंधती से बेहतर नमकभक्त है..
धन्यवाद ....