Friday, May 8, 2015

नेपाल और भारतीय मीडिया। क्या है हक़ीक़त?

भारतीय टीवी न्यूज चैनलों के सतही, सनसनीबाज रवैये पर देश में भी सवाल उठते रहते हैं। लिहाजा वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे पर हैशटैग के साथ नेपाली टिप्पणी 'गो होम इंडियन मीडिया' ट्विटर पर पूरी दुनिया में ट्रेंड करती रही तो इसे लेकर ज्यादा दुखी होने की जरूरत नहीं है। भारत में छोटे पर्दे पर चलने वाली खबरों का हाल बुरा है, लेकिन बाकी दुनिया में भी यह खास अच्छा नहीं है।

संवेदनशीलता इस मीडियम की विशेषता नहीं है, हालांकि समय बीतने के साथ कामकाज में थोड़ा पक्कापन आने की उम्मीद जरूर की जाती है। चिंता की बात दूसरी है, जिस पर अमल तो दूर, फिलहाल कोई सोचने को भी राजी नहीं है। भारत छोटे-छोटे पड़ोसियों से घिरा एक विशाल देश है। यह भौगोलिक स्थिति भारतीय कूटनीति के लिए एक स्थायी समस्या बनी रहती है। कोई पड़ोसी देश मुश्किल में पड़ जाए और आप आगे बढ़कर उसकी मदद न करें तो पूरी दुनिया आपकी लानत-मलामत पर उतारू हो जाती है। और अगर मदद करने में आपने ज्यादा उत्साह दिखा दिया तो संबंधित देश को लगता है कि उसकी अपनी तो कोई औकात ही नहीं बची।

नेपाल को लें तो पिछले पंद्रह वर्षों में वहां भारत विरोधी हिंसक प्रदर्शन ऐसे विचित्र-विचित्र मुद्दों पर भड़क उठे हैं कि सामान्य स्थितियों में उनका जिक्र भी झेंप पैदा करता है। एक बार तो वहां हृतिक रोशन के एक ऐसे 'बयान' पर सैकड़ों दुकानें फूंक दी गई थीं, जो उन्होंने दिया भी नहीं था! 'भारत का वर्चस्ववादी षड्यंत्र' वहां हर चुनाव में मुद्दा बना रहता है। ऐसे में हमारे राजनेताओं और राजनयिकों के लिए अच्छा यही होता है कि वे ज्यादा से ज्यादा काम करें और कम से कम बोलें- जैसा उनके चीनी जोड़ीदार किया करते हैं।
लेकिन दुर्भाग्यवश, ज्यादा बोलना अभी भारतीय राजनीति में सफलता का पर्याय बना हुआ है, जिसके चलते भारतीय मीडिया ही नहीं, हर समर्थ व्यक्ति को 'ओवर द टॉप' होने, देसी जुबान में कहें तो छत पर चढ़कर बांग देने का लाइसेंस मिल गया है। भारतीय सुरक्षा बलों और राहत कर्मियों ने नेपाल में इतना अच्छा काम किया है। उनका सारा किया-धरा मिट्टी में न मिल जाए, इसके लिए अपनी आवाज और चेहरे पर मुग्ध लोगों से निवेदन है कि कृपया संयत रहें।

GST बिल पर एक नज़र।

वस्तु एवं सेवा कर विधेयक, जीएसटी बिल पर बारह साल से बनी जड़ता आखिरकार टूटी और यह लोकसभा में पारित हो गया। हालांकि कानून बनने के लिए आज भी इसे लंबा रास्ता तय करना है। अभी इसे राज्यसभा से पास होना है, और चूंकि यह संविधान संशोधन विधेयक है, इसलिए इसे कुल 29 के आधे से ज्यादा, यानी 16 राज्यों की विधानसभाओं से भी मंजूरी लेनी पड़ेगी। वैसे, जीएसटी कर व्यवस्था को अगले साल अप्रैल से अमल में लाने की योजना है।

इसे आजादी के बाद अप्रत्यक्ष करों के क्षेत्र में पहला बड़ा सुधार माना जा रहा है। सरकार इस पर कुछ विपक्षी दलों को भी साथ लाने में कामयाब हुई है। जीएसटी के लागू होते ही केंद्र को मिलने वाली एक्साइज ड्यूटी और सर्विस टैक्स खत्म हो जाएंगे, जबकि राज्यों को वैट, मनोरंजन कर, लग्जरी टैक्स, लॉटरी टैक्स, एंट्री टैक्स, चुंगी वगैरह से हाथ धोना पड़ेगा। पेट्रोल, डीजल, केरोसिन तेल और रसोई गैस पर अलग-अलग राज्य में जो टैक्स लगते हैं, वे आगे भी कुछ साल तक जारी रहेंगे। शराब को इससे बाहर रखा गया है। जीएसटी से आम उपभोक्ता को यह लाभ होगा कि उसे सारी चीजें और सेवाएं देश भर में एक ही रेट पर मिलेंगी। अभी तो यूपी या हरियाणा के लोगों को गाड़ी खरीदने या पेट्रोल भराने के लिए दिल्ली आना पड़ता है।

जीएसटी अमल में आ गया तो यह चक्कर अगले साल खत्म हो जाएगा। अभी सामान खरीदने पर एक कंस्यूमर 30 से 35 फीसदी तक टैक्स चुकाता है, जो जीएसटी के लागू होने पर 20 से 25 प्रतिशत तक आने की उम्मीद है। यानी चीजें थोड़ी सस्ती हो सकती हैं। जीएसटी आने के बाद व्यापारियों को हर दो राज्यों की सीमा पर चुंगी देने के झंझट से मुक्ति मिलेगी। इस बिल को 12 साल पहले ही तैयार किया गया था लेकिन विभिन्न राज्य इस पर आपत्ति जताते रहे हैं। दरअसल राज्यों को डर था कि कर की एकीकृत व्यवस्था होने से उनकी आय कम हो सकती है। यह डर उन राज्यों को ज्यादा था, जिनके कुल राजस्व का आधा हिस्सा पेट्रोल-डीजल से ही आता है।
ऐसे राज्यों को यह छूट दी गई है कि वे पेट्रोल, डीजल पर कुछ समय तक वर्तमान दर पर टैक्स लेते रहें। केंद्र सरकार ने राज्यों को यह भरोसा भी दिया है कि उनका जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई पांच साल तक केंद्र करेगा। इसके अलावा जीएसटी से जो टैक्स मिलेगा, वह केंद्र और राज्य में एक तय हिसाब से बंटेगा, कुछ इस तरह कि किसी को हानि न हो। जीएसटी परिषद में राज्यों की दो तिहाई भागीदारी तय कर उन्हें निर्णय प्रक्रिया में अहम भूमिका दी गई है।

लोकसभा में वोटिंग के वक्त वॉकआउट करने वाली कांग्रेस भी जीएसटी के खिलाफ नहीं है, पर उसका कहना है कि यूपीए सरकार ने जीएसटी काउंसिल में केंद्र और राज्यों के बीच वोटिंग के लिए जो मैकेनिज्म तैयार किया था, उसे नए बिल में हटा दिया गया है। कांग्रेस बिल में नगर निगमों और पंचायतों के लिए भी प्रावधान चाहती है। सरकार इन मुद्दों पर बातचीत कर सकती है।