Saturday, September 17, 2011

हार का अधिकार

हार गई टीम इंडिया.. लुट गया सम्मान.. छिन गया ताज.. दौरे में लगातार आठवीं हार.. नहीं रुक रहा हार का सिलसिला.. क्यों हार रही है टीम इंडिया.. अरे रुकिये जनाब.. आठ मैच हारे नहीं की बोलने लगे.. कि हार गई टीम इंडिया.. हार गई टीम इंडिया.. अरे साहब हारने के लिए भी जज्बे की जरुरत होती है.. एक दो मैच तो कोई भी टीम हार सकती है.. लेकिन आठ मैच लगातार हारना बड़ी बात होती है.. इसके लिए हौसले की जरुरत होती है.. जुनुनी होना पड़ता है.. पागलपन की जरुरत होती है.. और वो भी ऐसा जुनुन की मैदान पर उतरते के साथ सिर्फ हार ही हार नजर आए.. लेकिन टीम इंडिया ने कंसिसटेंट परफॉरमें देते हुए ये भी कर दिखाया.. क्या आपको जरा सी भी अंदाजा है कि इसके लिए टीम इंडिया को कितनी मेहनत करनी पड़ी होगी.. कितने IPL के मैचों खेलने पड़े होगें.. लगातार बिना थके क्रिकेट खेलते रहना पड़ा होगा.. कितना मुश्किल होता है IPL में चोट से खुद को बचाते हुए पैसों के लिए खेलते रहना.. औऱ फिर जब देश के लिए खेलना हो तो चोटिल हो जाना.. औऱ ये हार खास इसलिए भी है क्योंकि टीम ऐसे वक्त में मैच हार रही है जब हाल में ही वर्ल्ड चैम्पीयन बनी है... औऱ हाल में ही टेस्ट में दुनिया की नंबर वन टीम रही हो.. इतने तमगों के साथ हारना.. बाप रे बाप.. जूनुन चाहिए भाई साहब.. कितनी सम्मान की बात है कि हम टेस्ट रैंकिंग मे नंबर एक से नंबर तीन पर आ गए... अब आप ही बताइए कि एक बड़ी या तीन.. या फिर यूं कहे कि अक्ल बड़ी की भैंस.. टीम के हिसाब से तो भैंस.. लेकिन कितने दुख की बात है कि इतनी मेहनत करने के बाद भी टीम के साख, विश्वसनीयता और खेल पर सवाल उठाए जा रहे हैं.... अरे जरा सोचिए... क्या टीम इंडिया को हारने का मन नहीं करता.. क्या वो हमेशा जीतते रहें.. क्या टीम के सीने में दिल नहीं है हम उनकी भावनाओं को क्यूं नहीं समझ पाते. वैसे भी अगर भरतीय टीम हारी है तो उसमें टीम की खेल भावना है अब आप पूछेंगे की हारने में कैसी खेल भावना.. दरअसल दुसरों को भी तो मौका देना खेल भावना की परिचायक ही होता है और हमने तो इंग्लैंड को मौका दिया है.. सो इतनी छोटी सी बात पर हाय तौबा क्यूं मचा रहे हैं आप.. हम तो बस इतना कहेंग कि टीम ने जो हार का जज्बा दिखाया है वो कमाल का है औऱ सभी को उसका सम्मान करना चाहिए..

Thursday, September 15, 2011

विशालकाय हिंदी

हिंदी ...



"हिंदी हैं हम वतन है हिन्दुस्तां हमारा" ये चंद शब्द ऐसे है जो आय दिन हमारे कान में पड़ते रहते है, अभी हिंदी पखवाडा मनाया जा रहा है वैसे तो हम स्वतंत्रता दिवस भी मानते है और न जाने कितने तरह के दिवस लेकिन विषय सिर्फ दिवस के दिन ही याद रखा जाता है। चलिए लौटते हैं विषय पर हिंदी...

कहते है भाषा माँ होती है और फिर हिंदी हो, मराठी हो या अंग्रेजी, भाषा कसी राष्ट्र या प्रदेश के विकास में बाधक नहीं हो सकती है। और जो लोग इसे अपना हथियार बनाते है उनका मकसद साफ़ होता है..... स्वार्थ...
विडम्बना की बात ये की देश के शीर्ष में बैठे कुछ लोग जो देश के प्रतिनिधि है वो भी हिंदी से डरते है और देश में एक तबका ऐसा भी जो हिंदी में बात करना अपमानजनक समझता है।

भाषा की व्यापकता दर्शाता है की हमारा राष्ट्र कितना समृद्ध है । सिर्फ भारत ही एक ऐसा देश है जहा पर हर प्रान्त में अलग अलग भाषाए बोली जाती है, फिर भी हिंदी हमारी मुख्य भाषा है । भारत हिंदी में सोचता है, हिंदी में बोलता है, हिंदी में सुनता है और हिंदी में ही गुनता है । गाँधी जी समझते थे की हिंदी में योजक क्षमता ज्यादा है इसलिए उन्होंने १९०९ में ही लिखा था "हिन्दुस्तान की राष्ट्र भाषा हिंदी ही होनी चाहिए "

अगर बात की जाये अंग्रेजी की तो भारत में अंग्रेजी का मुकाबला हिंदी से हो ही नहीं सकता क्योंकि अगर ऐसा होता तो भारत की फिल्म इंडस्ट्री ६०-६५ हज़ार कड़ोर के पार नहीं होती। वर्ष १९४९ की बात की जाये तो भारत के नए महाराजाओ ने अंग्रेजी को महारानी और हिंदी को नौकरानी घोषित कर दिया था लेकिन हिंदी फिर भी पंख फैला कर उडी। क्योंकि भारत में हिंदी व्यापर की भाषा है, सुचना और संचार की भाषा है, राजनितिक प्रचार की भाषा है। हिंदी ने इंग्लिश, मराठी, तमिल, तेलगु, भोजपुरी इन सभी भाषाओ को अपनाया है । उर्दू पहले से ही हिंदी के आँचल में है और विदेशी अंग्रेजी भी पुरे ठिठाई के साथ हिंदी के अंत क्षेत्र में हेन्ग्लिश (हिंदी+इंग्लिश) बनकर समां गयी । हिंदी सर्व समावेशी है, हिंदी ज्ञान की भाषा है हिंदी विज्ञानं की भाषा है संस्कृत और दर्शन की भाषा है ।
भारत हिंदी में खेलता है हिंदी में पलता है हिंदी में हँसता है और गुंडाराज के थप्पड़ खाकर हिंदी में ही रोता है लेकिन फिर भी हिंदी भारत के मन की भाषा है।