Thursday, August 2, 2018

क्या रोहिंग्या जैसा होगा 40 लाख लोगों का हाल ?

पहचान और नागरिकता का प्रश्न असम में रहने वाले लाखों लोगों के लिए लंबे वक्त तक परेशानी का सबब बना रहा.
असम भारत का वो राज्य है, जहां बहुत-सी जातियों के लोग रहते हैं. बंगाली और असमी बोलने वाले हिंदू भी यहां बसते हैं और उन्हीं के बीच जनजातियों के लोग भी रहते हैं.
असम की तीन करोड़ बीस लाख की आबादी में एक तिहाई आबादी मुस्लिमों की हैं. आबादी के प्रतिशत के लिहाज से भारत प्रशासित कश्मीर के बाद सबसे ज़्यादा मुस्लिम यहीं रहते हैं.
इनमें से कई ब्रितानी शासन के दौरान भारत आकर बस गए प्रवासियों के वंशज हैं.
लेकिन पड़ोसी देश बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासी दशकों से चिंता का विषय रहे हैं. इनके खिलाफ छह साल तक प्रदर्शन किए गए. इस दौरान सैंकड़ों लोगों की हत्याएं हुईं.
इसके बाद 1985 में प्रदर्शनकारियों और केंद्र सरकार के बीच एक समझौता हुआ. सहमति बनी कि जो भी व्यक्ति 24 मार्च 1971 के बाद सही दस्तावेज़ों के बिना असम में घुसा है, उसे विदेशी घोषित किया जाएगा.
अब विवादित एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर जारी होने के बाद पता चला है कि असम में रह रहे क़रीब 40 लाख लोग अवैध विदेशी हैं.

आलोचना

बीते कुछ सालों में विशेष अदालतें करीब 1,000 लोगों को विदेशी घोषित कर चुकी थीं. इनमें ज़्यादातर बंगाली बोलने वाले मुस्लिम थे. ये लोग हिरासत केंद्रों में बंद हैं.
प्रवासियों के बच्चों को उनसे अलग करने की अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की नीति की दुनियाभर में आलोचना हुई. असम में भी ठीक उसी तरह परिवारों को तोड़ा गया है.
एनआरसी सूची आने के बाद रातों-रात लाखों लोग स्टेटलेस (किसी भी देश का नागरिक न होना) हो गए हैं. ऐसे में राज्य में हिंसा का ख़तरा भी बढ़ गया है.
असम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा वाली भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है. पार्टी पहले ही प्रवासी मुस्लिमों को वापस बांग्लादेश भेजने की बात कह चुकी है.
लेकिन पड़ोसी बांग्लादेश भारत की ऐसी किसी अपील को स्वीकार नहीं करेगा.
ऐसे में ये लोग भारत में ही रहेंगे और ठीक वैसे ही हालात पैदा होने का ख़तरा रहेगा, जैसे म्यांमार से बांग्लादेश भागे रोहिंग्या के साथ हुआ था.
दशकों से असम में रह रहे लोगों की भारतीय नागरिकता छीन ली गई है. अब ना तो ये लोग पहले की तरह वोट कर सकेंगे, ना इन्हें किसी कल्याणकारी योजना का लाभ मिलेगा और अपनी ही संपत्ति पर इनका कोई अधिकार नहीं रहेगा.
जिन लोगों के पास ख़ुद की संपत्ति है वो दूसरे लोगों का निशाना बनेंगे.
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी स्टेटलेसनेस को ख़त्म करना चाहती है, लेकिन दुनिया में क़रीब एक करोड़ लोग ऐसे हैं जिनका कोई देश नहीं. ऐसे में भारत के लिए हालिया स्थिति असहज करने वाली होगी.
मोदी सरकार पहले से इस बात को लेकर घबराई हुई है. सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री का कहना है कि जिन लोगों का नाम एनआरसी सूची में नहीं आया, उन्हें डिटेंशन कैंप में नहीं रखा जाएगा और नागरिकता साबित करने का एक और मौक़ा दिया जाएगा.
लेकिन दूसरी तरफ नया डिटेंशन कैंप बनाने की बात भी कही जा रही है, जिसमें नागरिकता साबित करने में नाकाम रहने वाले लोगों को रखा जाएगा.
साथ ही, वकीलों का कहना है कि जिन लोगों के नाम सूची में नहीं आए हैं वो लोग विशेष अदालत में अपील कर सकते हैं.
फिर तो इन लाखों लोगों की किस्मत का फैसला होने में दसियों साल लग जाएंगे.
भारत में उत्तर-पूर्व की स्थिति पर अध्ययन कर चुके सुबीर भौमिक का कहना है कि ये मामला बेहद पेचीदा हो चुका है.
वो कहते हैं, "अराजकता की संभावना बढ़ गई है. अल्पसंख्यकों में घबराहट है. बांग्लादेश में भी डर है कि कहीं ये शरणार्थियों उनके यहां ना आ पहुंचें. स्टेटलेस लोगों को डिटेंशन कैंप में भरने का मामला पूरी दुनिया का ध्यान खींचेगा. इन सब चीज़ों में खर्चा भी बहुत होगा."
इसमें कोई शक नहीं है कि अवैध प्रवासी असम में एक गंभीर समस्या बन गए हैं.

1971 में हज़ारों लोग बांग्लादेश से भागकर असम आ गए थे. यहां आने के बाद इन लोगों की आबादी बढ़ी और आज असम में इनकी तादाद लाखों में है.
इसकी वजह से राज्य पर कई असर पड़े, रहने के लिए जगह कम पड़ने लगी, भूखंड छोटे होते चले गए.
यहां रह रहे अवैध प्रवासियों की संख्या 40 लाख से एक करोड़ तक है. इनमें से ज़्यादातर खेती-बाड़ी का काम करते हैं.
एक अनुमान के मुताबिक़, असम के 33 ज़िलों में से 15 ज़िलों में इनकी अच्छी-ख़ासी मौजूदगी है.
1985 से विशेष अदालतें 85,000 से ज़्यादा लोगों को विदेशी घोषित कर चुकी है.
लेकिन कई लोगों का आरोप है कि नरेंद्र मोदी की बीजेपी ने चुनावी फ़ायदे के लिए सांप्रदायिकता को हवा दी है. पार्टी कह चुकी है कि अवैध मुस्लिम प्रवासियों को उनके देश वापस भेजा जाएगा, जबकि अवैध हिंदू प्रवासियों को यहीं रहने दिया जाएगा.
जाने-माने असमिया लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हिरेन गोहेन कहते हैं, "आप इसे सही कहें या ग़लत, लेकिन नागरिकता के इस मामले ने बहस छेड़ दी है. असम की राजनीति में ये अहम मुद्दा बन गया है. जब तक ये मामला सुलझ नहीं जाता, आप आगे नहीं बढ़ सकते."
"राज्य का असली नागरिक कौन हैं और बाहरी कौन हैं, ये पता लगाना ज़रूरी है."
एनआरसी सूची तैयार करने में अबतक 18 करोड़ डॉलर का ख़र्च आया है. इस सूची के आने के बाद लोगों में एक दूसरे के लिए नफरत और अविश्वास बढ़ा है.


Sunday, June 19, 2016

अंधेर नगरी चौपट राजा !


आज इस देश में दो महान कारनामे हुए. उत्तर प्रदेश सरकार कैराना मामले की जांच संतों से करवाएंगी. उधर, केंद्र सरकार ने क्रिकेटर चेतन चौहान को नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ फैशन टेक्नोलॉजी का चेयरमैन नियुक्त किया. 

सरकारें बहुत करीने से आहिस्ता-आहिस्ता एक-एक सीढ़ी नीचे धंसेंगी. उनके साथ देश भी धंसेगा. चरम अवस्था होगी जब बाबा बंगाली स्वास्थ्य मंत्री या एम्स के निदेशक बनेंगे. 

सोमवार और बुधवार को सेवा देने वाले हकीम एम जुनैद परमाणु कार्यक्रम संभालेंगे. या ढेला पुरवा का सपेरा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री बन जाएगा. मैं ही उदाहरण नहीं दे पा रहा. ये अच्छे दिन हैं. कुछ भी हो सकता है. कुछ भी मतलब कुछ भी.

Tuesday, June 14, 2016

मॉनसून सत्र में राज्यसभा (2016)

57 सीटों पर चुनाव के बाद क्या है समीकरण?


देश में इस वक्त एक ऐसी सरकार है जो कि 2 साल पहले प्रचंड बहुमत के साथ लोकसभा में आई। लेकिन फिर भी ये एक गठबंधन सरकार है। कोशिश ये थी कि लोकसभा के ज्यादा से ज्यादा सीटों पर वर्चस्व कायम हो और कामकाज में सरकार को परेशानी ना हो। कोशिश कामयाब भी है। सरकार को लोकसभाा में काम करने में कोई परेशानी नहीं होती चाहे माहौल कितना भी गर्म क्यों ना हो फिर भी  बिल तो पास हो ही जाते हैं। क्योंकि सत्ता पक्ष के पास यहां संख्याबल है।

रअसल मामला पलट जाता है राज्यसभा में जाकर। सरकार के लिए राहत की बात ये है कि राज्यसभा में एक चौथाई सीटों पर नए सिरों से चुनाव होने के बाद BJP मॉनसून सत्र में माहौल अपने पक्ष में होने की उम्मीद कर रही है। इससे अहम बिलों को पास कराने में मदद मिलेगी।


उपरी सदन में सीटों की संख्या है 250, सामान्य बहुमत के लिए संख्या चाहिए 122 और किसी भी बिल को पास कराने के लिए सदन में दो तिहाई बहुमत की जरुरत होती है यानी 162 सांसदों का सपोर्ट सरकार के पास होना चाहिए। तो अब सवाल ये कि क्या ये जादूई आंकड़ा मौजूदा सरकार छू सकती है। तो क्या है गणित राज्यसभा का आईए जानते हैं।


राज्यसभा की 57 सीटों पर चुनाव के बाद नतीजे सामने आ चुके हैं। मौजूदा तस्वीर में UPA और उसके करीबी दलों की संख्या है 86(निर्दलीय को जोड़ कर) और NDA और उसके करीबी दलों की संख्या है 84(निर्दलियो को जोड़कर), इनमें से केवल NDA के सांसदों की संख्या 74 है। लेकिन 37 ऐसे दलों के सासंद जो ना BJP की तरफ हैं और ना ही कांग्रेस की तरफ। इसमें नॉमिनेटेड, निर्दलिय, TMC, और BJD जैसे दल हैं।  इन दलों पर पकड़ बनाकर सरकार की राह इस सदन में आसान हो सकती है। लेकिन मसला ये है कि इनमें से 35 ऐसे सांसद हैं जो उन दलों से हैं जो BJP विरोधी राजनीति के लिए जाने जाते हैं। व
हीं इस सदन में बीजेपी के लिए अच्छी खबर ये है  कि यहां पार्टी ने पहली बार 50 के आंकड़े को पार किया है , क्योंकि हाल के विधानसभा चुनावों में BJP ने  अच्छा परफॉर्म किया है। हांलाकि असम में हुए चुनाव का पार्टी फायदा नहीं ले सकी क्योंकि वहां विधानसभा चुनाव से पहले राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव हो गए थे।

GST का क्या होगा?


ये सवाल इस लिए भी है क्यूंकि इस बिल को लंबे समय  से सरकार पास कराने की सरकार कोशिश कर रही है। केंद्र के लिए राहत की बात ये है कि शीैतकालीन (2015) सत्र में कांग्रेस और लेफ्ट के छोड़ कर सभी दल इस बिल के समर्थन में नज़र आ रहे थे। वहीं DMK पशोपेश में, सरकार की थोड़ी कोशिश पर उसे इस दल का साथ मिल सकता है। वैसे लेफ्ट भी इस मामले में लेफ्ट का रुख नरम हुआ है। जो कि बिल के लिए अच्छा संकेत माना जा सकता है। वहीं GST सपोर्ट करने वाले 15 सांसद राज्यसभा में आए हैं।

लेकिन ये सब इतना आसान भी नहीं होने जा रहा है। सदन के नियम के मुताबिक बिल को पास कराने के लिए सदन का ऑर्डर में रहना ज़रुरी है। अगर कांग्रेस बिल के विरोध में अड़ी रहती है तो हंगामे के चलते बिल फंस सकता है। राज्यसभा से पास होने के बाद इस बिल को 15 राज्यों के विधानसभा से भी गुज़रना होगा जो मौजूदा हालात में सरकार के लिए ज्यादा मुश्किल नहीं है।

राज्यसभा में अटके पड़े बिल।
वैसे तो राज्यसभा में लंबित पड़े बिलों की फेहरिस्त लंबी है। शीतकालीन सत्र की बात करें तो राज्यसभा से केवल 4 ही बिल पारित कराए जा सके बाकी सदन की कार्यवाही हंगामे की भेंट चढ़ गई। इस पर संसदीय कार्यमंत्री वैंकय्या नायडू ने कहा--

संसद के शीतकलीन सत्र के दौरान राज्यसभा में केवल चार ही विधेयक पारित हो पाए जबकि 13 विधेयक अभी भी लंबित हैं। लगातार हंगामे के कारण राज्यसभा की कार्यवाही बाधित हो रही है। इसलिए संसदीय कार्यमंत्री एम वेंकैया नायडू ने राज्यसभा के सदस्यों से अनुरोध किया कि ज्यादा से ज्यादा विधेयक पारित कराए।

लेकिन लगता है वैंकय्या जी को पता नहीं कि राज्यसभा में अभी 45 विधेयक लंबित हैं और उनमें से कुछ तो करीब 30 साल पहले ही सदन में पेश किए गए थे। वहीं लोकसभा में मई में समाप्त सत्र तक पांच विधेयक ऐसे थे, जिनका निपटारा किया जाना है।

व्हिसिल ब्लोअर सुरक्षा विधेयक भी लंबित
एक अन्य प्रमुख विधेयक व्हिसिल ब्लोअर सुरक्षा (संशोधन) विधेयक, 2015 भी सदन में लंबित है। यह विधेयक पिछले साल दिसंबर में पेश किया गया था और इस पर चर्चा अभी पूरी नहीं हुई है। इस साल के दोनों सत्रों में इस विधेयक पर आगे चर्चा नहीं हो सकी। वहीं लोकसभा में लंबित महत्वपूर्ण विधेयकों में उपभोक्ता संरक्षण विधेयक 2015 और बेनामी लेनदेन (निषेध) संशोधन विधेयक, 2015 शामिल हैं।

इससे पहले वित्तमंत्री अरुण जेटली ने संकेत दिया था कि संसद के अगले सत्र में जीएसटी विधेयक की दिशा में प्रगति हो सकती है। इसके साथ ही उन्होंने भरोसा जताया था कि विधेयकों का समर्थन करने वाले दलों की शक्ति राज्यसभा में बढ़ने से 'विधायी कार्यों' में तेजी आएगी और कार्यवाही में व्यवधान पैदा नहीं होगा। उनसे राज्यसभा के लिए हाल में हुए चुनाव के परिणाम में कांग्रेस के सदस्यों की संख्या में कमी आने और जीएसटी विधेयक की संभावना के बारे में पूछा गया था। मुख्य विपक्षी पार्टी जीएसटी विधेयक का विरोध कर रही है और कुछ संशोधनों की मांग कर रही है।

1987 में पेश विधेयक भी अब तक लंबित
संसद के पिछले कुछ सत्रों में हंगामेदार स्थिति रही थी, लेकिन सरकारी कामकाज के लिहाज से पिछले सत्र के कामकाज में सुधार हुआ। हालांकि लंबित विधेयकों की समस्या एनडीए सरकार के दो साल तक ही सीमित नहीं है। कुछ विधेयक तो दशकों से लंबित हैं। इनमें भारतीय चिकित्सा परिषद (संशोधन) विधेयक, 1987, प्रबंधन में कामगारों की हिस्सेदारी विधेयक 1990 और संविधान (79वां संशोधन) विधेयक, 1992 शामिल हैं। चिकित्सा परिषद विधेयक पर संयुक्त समिति की रिपोर्ट जुलाई 1989 में पेश की गई थी, वहीं कामगार प्रबंधन विधेयक पर संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट विधेयक पेश होने के 11 साल बाद यानी दिसंबर 2001 में राज्यसभा में पेश की गई।

अन्य प्रमुख लंबित विधेयकों में वक्फ संपत्ति (अनधिकृत कब्जे से मुक्ति) विधेयक, 2014, भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक, 2016 शामिल हैं। उच्च सदन में लंबित विधेयकों में निजी जासूसी एजेंसियां (नियमन) विधेयक, 2007 शामिल है। गृह मंत्रालय से संबंधित इस विधेयक पर स्थायी समिति की रिपोर्ट फरवरी 2009 में ही पेश कर दी गई थी।

राज्यसभा को लेकर BJP की बांछे खिली हुईं हैं। जुलाई के आखिरी हफ्ते में शुरू हो रहे मॉनसून सत्र का पूरा फायदा उठाने की तैयारी है। 54 सांसदों के विदाई के मौके पर PM ने भी कहा था कि आने वाले समय में हालात बदलेंगे। लेकिन एक सच्चाई ये भी है कि उपरी सदन यानी के राज्यसभा में आज भी कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है।



(त्रुटि दिखने पर मुझे मेल करें, धन्यवाद)

Tuesday, June 7, 2016

भ्रष्टाचार बनाम भारत सरकार

भ्रष्टाचार पर सरकारों के दावे और हकीकत!


हाल में जब PM मोदी जी जब कतर में बलो रहे थे तब उन्होने भ्रष्टाचार को लेकर कई दावे किए। स्कूल से लेकर राशन कार्ड तक तरह तरह की कहानियां सुनाईं। बहरहाल साधारण सी बात है कि वो ये बता रहे थे कि उन्होंने सफाइ का काम शुरू कर दिया है और इसमें थोड़ा वक्त लगेगा। जो बात वाजिब भी नज़र आती है। क्योंकि इसकी जड़ें अपने देश में काफी मज़बूत हैं। लेकिन क्या वाकई भष्टाचार के इस दानव को कुचलने के लिए सही हथियार इस्तेमाल किए जा रहे हैं या यूं कहें कि क्या वाकई सरकार के पास वो हथियार हैं जो करप्शन पर नकेल कसने के लिए काफी है। मेरी मानें तो ऐसा लगता नहीं है। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार काम नहीं कर रही रही है लेकिन रफ्तार और माध्याम को लेकर सवाल है। दरअसल करप्शन को लेकर आज तक सरकारों ने हमें इतना मूर्ख बनाया है कि हमें पता ही नहीं कि हम इस दलदल में कहां तक धंस चुके हैं।  तो चलिए पड़ताल करते हैं। शायद आपको जानकर हैरानी हो कि भ्रष्टाचार से निपटने की व्यवस्था करने संस्थाएं और पारदर्शी ढांचा तैयार करने के मामले में हम उन 175 देशों में सबसे पीछे हैं जिन्होंने साल 2003 में संयुक्त राष्ट्र की भष्टाचार रोधी संधी पर दस्तखत किए थे। हमसे आगे वो मुल्क है जिसे हम पानी पी पी कर कोसते है। जी हां पाकिस्तान। इसके अलावा मलेशिया इंडोनेशिया भूटान और वियतनाम जैसे देश भी हमसे आगे हैं।

थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं। आपको शायद याद हो साल 2011 में करप्शन लोकपाल और राजनीति तीनों आमने सामने थे ऐसा लग रहा था मानो अपने देश से इसका सफाया बस होने ही वाला था। लेकिन आलम तो ये है कि लोकपाल के गीत गा गा कर बनी सरकार भी लोकपाल को भूल गई। बाकियों को तो छोड़ ही दीजिए पर इस रेलम पेल का नतीजा ये रहा कि लोकपाल कानून साल 2014 से तकनीकि तौर पर लागू है लेकिन लोकपाल महोदय कहां हैं? किसी को नहीं पता।

दिसंबर 2014 में मोदी सरकार ने लोकपाल कानून को संशोधन और पुनर्विचार के लिए कानून मंत्रालय के संसदीयसमिती को सौंप दिया। एक साल बाद दिसंबर 2015 में इस समिती ने केंद्रीय सतर्कता आयोग और CBI की भ्रष्टाचार रोधी विंग को लोकपाल के दायरे में लाने कि सिफारिश सरकार को सौंप दी। इसके बाद की कहानी नहीं पता। ना तो कानून का पता और ना ही उनलोगों का जो लोकपाल के नाम पर दिन रात आंदोलन और धरना करते थे। केंद्र सरकार ने भी इसपर अब तक कोई ठोस जानकारी नहीं दी।

ये तो रही लोकपाल की बात लेकिन UN  की संधी के मुताबिक सरकार को भ्रष्टाचार  के खिलाफ पांच और कानून बनाने थे।
1- भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाले की सुरक्षा के लिए व्हिसलब्लोअर बिल
2- सरकारी सेवाओं मेें भ्रष्टाचार रोकने के लिए भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन का विधेयक
3- नागरिक सेवाओं से जुड़े अधिकारों के लिए सिटिजन चार्टर एंड ग्रीवांस रिड्रेसल बिल
4- अदालतों में पारदिर्शिता के लिए ज्युडिशयल अकाउंटिबिलिटि बिल
5- विदेशी अधिकारियों और अंतराष्ट्रीय संगठनों में रिश्वतखोरी रोकने के लिए विधेयक

इन्हे लेकर पिछले दो सला में सरकार की नीति स्पष्ट  नहीं रही है। और न ही सरकार ने कोई दृढ़ मंशा दिखाई है। साफ है कि आज़ादी से लेकर अब तक भ्रष्टाचार को खत्म करने के नाम पर सरकारों ने नूरा कुश्ति ही कि है। और सियासी पार्टियों ने लोगों को मूर्ख बना कर लोगों का वोट हासिल किया है। भ्रष्टाचार को रोकने के लिए मज़बूत और स्वतंत्र मॉनिटरिंग एजेंसी, भ्रष्टाचार की नियमित जांच परख, जांच के लिए पर्याप्त ढांचा और तकनीक, और भ्रष्टाचार पर तेज़ फैसले देने वाली अदालतें। लेकिन डब आप भारत की तरफ देखेंगे तो आपको इनमें से कुछ भी नहीं दिखेगा। यहां तो अभी तक बुनियाद ही नहीं है इमारत काा सवाल ही पैदा नहीं होता। UN के साथ संधि किए 13 साल गुज़र चुके हैं लेकिन किसी भी सरकार ने वो इच्छा संकल्प या यूं कहे कि मंशा ही नहीं दिखाइ जिससे लोगों को ऐसा लगे कि मामला भ्रष्टाचार की टहनियों तक नहीं, जड़ों तक पहुंच गया है।


Friday, May 8, 2015

नेपाल और भारतीय मीडिया। क्या है हक़ीक़त?

भारतीय टीवी न्यूज चैनलों के सतही, सनसनीबाज रवैये पर देश में भी सवाल उठते रहते हैं। लिहाजा वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे पर हैशटैग के साथ नेपाली टिप्पणी 'गो होम इंडियन मीडिया' ट्विटर पर पूरी दुनिया में ट्रेंड करती रही तो इसे लेकर ज्यादा दुखी होने की जरूरत नहीं है। भारत में छोटे पर्दे पर चलने वाली खबरों का हाल बुरा है, लेकिन बाकी दुनिया में भी यह खास अच्छा नहीं है।

संवेदनशीलता इस मीडियम की विशेषता नहीं है, हालांकि समय बीतने के साथ कामकाज में थोड़ा पक्कापन आने की उम्मीद जरूर की जाती है। चिंता की बात दूसरी है, जिस पर अमल तो दूर, फिलहाल कोई सोचने को भी राजी नहीं है। भारत छोटे-छोटे पड़ोसियों से घिरा एक विशाल देश है। यह भौगोलिक स्थिति भारतीय कूटनीति के लिए एक स्थायी समस्या बनी रहती है। कोई पड़ोसी देश मुश्किल में पड़ जाए और आप आगे बढ़कर उसकी मदद न करें तो पूरी दुनिया आपकी लानत-मलामत पर उतारू हो जाती है। और अगर मदद करने में आपने ज्यादा उत्साह दिखा दिया तो संबंधित देश को लगता है कि उसकी अपनी तो कोई औकात ही नहीं बची।

नेपाल को लें तो पिछले पंद्रह वर्षों में वहां भारत विरोधी हिंसक प्रदर्शन ऐसे विचित्र-विचित्र मुद्दों पर भड़क उठे हैं कि सामान्य स्थितियों में उनका जिक्र भी झेंप पैदा करता है। एक बार तो वहां हृतिक रोशन के एक ऐसे 'बयान' पर सैकड़ों दुकानें फूंक दी गई थीं, जो उन्होंने दिया भी नहीं था! 'भारत का वर्चस्ववादी षड्यंत्र' वहां हर चुनाव में मुद्दा बना रहता है। ऐसे में हमारे राजनेताओं और राजनयिकों के लिए अच्छा यही होता है कि वे ज्यादा से ज्यादा काम करें और कम से कम बोलें- जैसा उनके चीनी जोड़ीदार किया करते हैं।
लेकिन दुर्भाग्यवश, ज्यादा बोलना अभी भारतीय राजनीति में सफलता का पर्याय बना हुआ है, जिसके चलते भारतीय मीडिया ही नहीं, हर समर्थ व्यक्ति को 'ओवर द टॉप' होने, देसी जुबान में कहें तो छत पर चढ़कर बांग देने का लाइसेंस मिल गया है। भारतीय सुरक्षा बलों और राहत कर्मियों ने नेपाल में इतना अच्छा काम किया है। उनका सारा किया-धरा मिट्टी में न मिल जाए, इसके लिए अपनी आवाज और चेहरे पर मुग्ध लोगों से निवेदन है कि कृपया संयत रहें।

GST बिल पर एक नज़र।

वस्तु एवं सेवा कर विधेयक, जीएसटी बिल पर बारह साल से बनी जड़ता आखिरकार टूटी और यह लोकसभा में पारित हो गया। हालांकि कानून बनने के लिए आज भी इसे लंबा रास्ता तय करना है। अभी इसे राज्यसभा से पास होना है, और चूंकि यह संविधान संशोधन विधेयक है, इसलिए इसे कुल 29 के आधे से ज्यादा, यानी 16 राज्यों की विधानसभाओं से भी मंजूरी लेनी पड़ेगी। वैसे, जीएसटी कर व्यवस्था को अगले साल अप्रैल से अमल में लाने की योजना है।

इसे आजादी के बाद अप्रत्यक्ष करों के क्षेत्र में पहला बड़ा सुधार माना जा रहा है। सरकार इस पर कुछ विपक्षी दलों को भी साथ लाने में कामयाब हुई है। जीएसटी के लागू होते ही केंद्र को मिलने वाली एक्साइज ड्यूटी और सर्विस टैक्स खत्म हो जाएंगे, जबकि राज्यों को वैट, मनोरंजन कर, लग्जरी टैक्स, लॉटरी टैक्स, एंट्री टैक्स, चुंगी वगैरह से हाथ धोना पड़ेगा। पेट्रोल, डीजल, केरोसिन तेल और रसोई गैस पर अलग-अलग राज्य में जो टैक्स लगते हैं, वे आगे भी कुछ साल तक जारी रहेंगे। शराब को इससे बाहर रखा गया है। जीएसटी से आम उपभोक्ता को यह लाभ होगा कि उसे सारी चीजें और सेवाएं देश भर में एक ही रेट पर मिलेंगी। अभी तो यूपी या हरियाणा के लोगों को गाड़ी खरीदने या पेट्रोल भराने के लिए दिल्ली आना पड़ता है।

जीएसटी अमल में आ गया तो यह चक्कर अगले साल खत्म हो जाएगा। अभी सामान खरीदने पर एक कंस्यूमर 30 से 35 फीसदी तक टैक्स चुकाता है, जो जीएसटी के लागू होने पर 20 से 25 प्रतिशत तक आने की उम्मीद है। यानी चीजें थोड़ी सस्ती हो सकती हैं। जीएसटी आने के बाद व्यापारियों को हर दो राज्यों की सीमा पर चुंगी देने के झंझट से मुक्ति मिलेगी। इस बिल को 12 साल पहले ही तैयार किया गया था लेकिन विभिन्न राज्य इस पर आपत्ति जताते रहे हैं। दरअसल राज्यों को डर था कि कर की एकीकृत व्यवस्था होने से उनकी आय कम हो सकती है। यह डर उन राज्यों को ज्यादा था, जिनके कुल राजस्व का आधा हिस्सा पेट्रोल-डीजल से ही आता है।
ऐसे राज्यों को यह छूट दी गई है कि वे पेट्रोल, डीजल पर कुछ समय तक वर्तमान दर पर टैक्स लेते रहें। केंद्र सरकार ने राज्यों को यह भरोसा भी दिया है कि उनका जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई पांच साल तक केंद्र करेगा। इसके अलावा जीएसटी से जो टैक्स मिलेगा, वह केंद्र और राज्य में एक तय हिसाब से बंटेगा, कुछ इस तरह कि किसी को हानि न हो। जीएसटी परिषद में राज्यों की दो तिहाई भागीदारी तय कर उन्हें निर्णय प्रक्रिया में अहम भूमिका दी गई है।

लोकसभा में वोटिंग के वक्त वॉकआउट करने वाली कांग्रेस भी जीएसटी के खिलाफ नहीं है, पर उसका कहना है कि यूपीए सरकार ने जीएसटी काउंसिल में केंद्र और राज्यों के बीच वोटिंग के लिए जो मैकेनिज्म तैयार किया था, उसे नए बिल में हटा दिया गया है। कांग्रेस बिल में नगर निगमों और पंचायतों के लिए भी प्रावधान चाहती है। सरकार इन मुद्दों पर बातचीत कर सकती है।

Monday, March 24, 2014

क्यों लोकसभा चुनाव है...


लोकसभा चुनाव है, जनतंत्र का पर्व है...

खाली पेट रैलियों में, रोटियों की आस है
वोटर आज भी आम है, नेता हो चुके खास हैं
धूप सीना फाड़ती, आंखों में दर्द है...
लोकसभा चुनाव है, जनतंत्र का पर्व है..

देखो फिर आ गए वोट ये लूटने
आपके दर पर हाथ जोड़कर टूटने
शून्य इनका कर्म है, नीतियां सर्द हैं
लोकसभा चुनाव है, जनतंत्र का पर्व है

लो शुरु हो गई है, जात की राजनीति
फिर भी जिंदा हैं लोग, उम्मीदों की बात है
विकास लहूलुहान है, लेकिन नेताओं को गर्व है
लोकसभा चुनाव है, जनतंत्र का पर्व है

दिल्ली के केजरी, गुजरात के मोदी
आज के नेताओं ने उम्मीदें हैं तोड़ दीं
ठगा हुआ मानस फिर खुद से पूछ रहा
क्यों लोकसभा चुनाव है, क्यों जनतंत्र का पर्व है
              
                       विवेक शांडिल्य