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| सचिन तेंदुलकर व पीटर सिडल |
Friday, January 27, 2012
मैच ही नहीं काफी कुछ हार चुकी है टीम इंडिया
Wednesday, January 25, 2012
एक खिलाड़ी ऐसा भी था...
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| मेजर ध्यानचंद |
Tuesday, January 24, 2012
मशीन नहीं हैं सचिन
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| सचिन तेंदुलकर |
Saturday, January 21, 2012
"मैं भगवान नहीं हूँ"

भारतीय टीम इस वक्त बुरे दौर से गुजर रही है और टीम के लगभग सभी अनुभवी खिलाड़ी भी अपनी फॉर्म से दो दो हाथ करने में लगे हैं । खराब प्रदर्शन का दौर इंग्लैड से शुरु हुआ था जो कंगारुओं की जमीं तक जारी है। लगातार मिल रही हार से सभी परेशान हैं और ऐसे में क्रिकेट फैंस की नाराजगी भी वाजिब है । खासकर सचिन, द्रविड़ और लक्ष्मण से क्योंकि इनसे फैंस की उम्मीदें हमेशा दोगुनी रहती है। लेकिन इन सब के बीच जब बात सन्यास की आती है तो कोई भी क्रिकेट प्रेमी ये सोचने पर जरुर मजबूर हो जाता है कि इसके बाद भारतीय क्रिकेट किस दिशा में जाएगा। उसके दिल में ये खौफ जरूर आता है कि अगर भारतीय क्रिकेट के ये महारथी गए तो हो सकता है कि भारतीय टीम बिना हाड़ वाला शरीर रह जाए। जो जिंदा तो रहेगी पर किसी काम की नहीं, क्योंकि हम उनकी विदाई के लिए शायद तैयार नहीं हैं। खैर ये तो बात रही तीन महारथीयों की लेकिन आप जरा ये फर्ज कीजिए कि सचिन कल ही सन्यास लेने वाले हों, सोच के ही डर लगता है। वो इतने महान है, जिसका अंदाजा लगा पाना नामुमकिन सा लगता है। जब सचिन ने खेलना शुरु किया था यानी 1989 से लेकर अब तक 23 साल का लंबा करियर, इतना लंबा कि एक पूरी जेनरेशन जन्म लेने के बाद टीनेज से बाहर आ चुकी है। अंदाजा लगा सकते हैं कि कितना अनुभव है इस महान बल्लेबाज के पास। टेस्ट और एकदिवसीय मैचों को जोड़ दिया जाए तो आंकड़े इतने उंचे है कि आप वहां तक नजरे नहीं पहुंचा सकते हैं। 641 अंतराष्ट्रीय क्रिकेट मैच का अनुभव, 291 फर्स्ट क्लास मैचेस, 33,553 अंतराष्ट्रीय रन, तो वहीं घरेलू क्रिकेट में 48,104 रन, 99वें अंतराष्ट्रीय शतक, 160 अंतराष्ट्रीय अर्धशतक, 138 घरेलू शतक, यही नहीं वनडे में 86.32 की स्ट्राइक रेट, 1,981 अंतराष्ट्रीय वनडे चौके, 149 अंतराष्ट्रीय कैच, 6 टेस्ट दोहरे शतक, वनडे में नाबाद 200 रन। ये तो महज चंद रिकॉर्ड्स हैं जो सचिन की काबिलीयत को बयां करते हैं, वरना फेहरीस्त तो काफी लंबी है। सचिन तेंदुलकर भारतीय क्रिकेट का वो सितारा हैं जो अपनी चमक से पूरी दुनिया में भारत को रोशन करता है।
Friday, January 20, 2012
ऑस्ट्रेलिया में आखिरी मौका !

ऑस्ट्रेलिया में आखिरी मौका !
भारत जब ऑस्ट्रेलिया दौरे पर जा रहा था तब उम्मीदें थीं....कई सारे सपने थे.... टेस्ट का ताज वापस पाना था और न जाने क्या क्या... लेकिन 26 दिसंबर से शुरु होने वाली सीरीज में सब कुछ बदल गया... सारी उम्मीदें धरी की धरी रह गईं हम हार से हारते रहे... पहले और दूसरे टेस्ट में हार के बाद टीम पर वापसी करने का बेतहाशा दबाव बना और इस दबाव के नीचे न तो अनुभव काम आया... न तो युवा जोश और ना ही टीम की एकजुटता... पूरी की पूरी टीम बिखर गई... अब तक तीन टेस्ट मैच हार चुकी टीम वापसी कर पाएगी भी या नहीं कहना मुश्किल है.... लेकिन संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता....सीरीज का आखिरी टेस्ट मैच एडिलेड में खेला जाना है और हालात भी बदले बदले से होंगे यानी टीम एक नई शुरुआत यहां से कर सकती है... तीसरा मैच तीन दिन में हीं खत्म हो गया था... पर्थ टेस्ट मैच 13 जनवरी से शुरु होकर 15 जनवरी तक ही चला जिसमें टीम इंडिया 3 दिन में ही पस्त हो गई.... अगला मुकाबला 24 जनवरी से खेला जाना है... इस बीच टीम को काफी वक्त मिला है जिससे हो सकता है कि टीम पिछली सारी कड़वी यादों से उबर चुकी हो... साथ ही मैदान पर अभ्यास का लंबा वक्त इस मैच में कप्तान के तौर पर टीम में वीरेंद्र सहवाग नजर आएंगे, कप्तानी में सहवाग पहले भी हाथ आजमा चुके हैं और आंकड़े भी दमदार है... तीन टेस्ट में कप्तान के तौर पर उन्होने 2 में जीत हसिल की है तो एक मुकाबला ड्रॉ रहा है... साफ है कि सहवाग के पास भी यहां से एक नई शुरुआत का मौका होगा... याद होगा कि टीम के इस नवाब ने 2008 में इसी मैदान पर 151 रन की बेहतरीन पारी खेली थी... गौरतलब है कि चौथे टेस्ट मैच से पहले टीम इंडिया के लिए कुछ अच्छे संकेत मिल रहे हैं लेकिन क्या भारतीय टीम आखिरी टेस्ट मैच में अपनी खोई साख हासिल कर पाएगी.... अपने प्रशंसकों का खोया प्यार हासिल कर पाएगी.... कंगारुओं को करारा जवाब दे पाएगी... सवाल कई सारे हैं और जवाब के लिए आपको 24 जनवरी तक का इंतजार करना पड़ेगा...
Thursday, January 19, 2012
लापरवाह बेपरवाह बीसीसीआई !!!
किसी भी टीम के लिए मजबूत मध्यक्रम का होना बहुत अहम होता है जिससे टीम में एक आधार बनी रहे लेकिन भारत के खिलाड़ी मिडिल डिस ऑर्डर बन चुके हैं. कहते हैं कि पारी अगर बिगड़ जाए या टीम को खराब शुरुआत मिले तो मिडिल ऑर्डर की ही जिम्मेदारी होती है वो टीम को संभाल कर एक सम्मानजनक स्थिती में ले जाए. लेकिन न तो कोहली में वो बात नजर आई है और न ही कप्तान धोनी वो कमाल कर पाए हैं. चलिए थोड़ा फ्लैश बैक में आपके लिए चलते हैं. वैसे तो कप्तान साहब को टेस्ट क्रिकेट कभी रास ही नहीं आया फिर भी आंकड़ों को देखें तो ये बात और भी साफ हो जाती है.
वेस्टइंडीज में धोनी ने तीन टेस्ट मैच खेले जिसमें 19.4 की औसत से 97 रन बनाए. यही नहीं यहां उनका उच्चतम स्कोर महज 74 रन ही रहा... यानी बाकी के दो मैचों में 23 रन. थोड़ा आगे चलें तो टीम इंग्लैड पहुंची. वहां भी कप्तान धोनी का बल्ला कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हुआ. हांलाकि कप्तान साहब ये राग जरुर अलापते रहे की हम वापसी करेंगे. वहां धोनी ने 4 मैच खेले जिसमें 31.42 की औसत से 220 रन अपने नाम किए. लेकिन यहां भी वो 77 रन से आगे नहीं जा सके. फिर लगा कि नाकामियों का सिलसिला कंगारुओं की जमीं पर टूट जाएगा. लेकिन कप्तान साहब तो कुछ और ही कसम खाए बैठे थे. वहां 3 टेस्ट खेलते हुए 20.40 की औसत से 102 रन बनाए हैं. कप्तान के तौर पर देश को निराश करने वाले धोनी को चौथे टेस्ट में स्लो ओवर रेट के कारण बैन कर दिया गया है. यानी खेल खतम पैसा हजम. रही बात कोहली की तो वो भी टेस्ट क्रिकेट में जीरो बटा सन्नाटा ही नजर आते हैं. वेस्टइंडीज में कोहली ने 3 मैच खेले जिसमें 15.20 की औसत से शानदार 76 रन बनाए उच्चतम स्कोर 30 रन रहा... तो वहीं उनका सौभाग्य रहा की वो इंग्लैड में नहीं खेल पाए वरना आंकड़े और भी दयनीय हो जाते. रही बात मौजूदा ऑस्ट्रेलियाई सीरीज की तो वो यहां पर भी अपने आप को साबित करने में नाकाम रहे. यहां 3 मैच खेलते हुए 27 की औसत से कोहली ने 162 रन बनाए जिसमें उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 75 रन रहा... आंकड़े गवाह रहे हैं कि इन खिलाड़ियों ने खराब खेल के बावजूद अपने खेल में सुधार नहीं किया. कहते हैं सबक लेने के लिए एक गलती काफी होती है लेकिन इन खिलाड़ियों को इतने मौके दिए जाते रहे की गलतियां इनके लिए सबक नहीं महज भुला देने वाले आंकड़े बन गए... ये BCCI की लापरवाही के अलावा और कुछ भी नहीं अगर खिलाड़ियों को खराब खेल के कारण पहले ही बाहर का रास्ता दिखाया गया होता तो भारतीय क्रिकेट आज इस मुकाम पर नहीं खड़ा होता.


