क्या दिल्ली में नेताओं के
इरादे नेक हैं...? या फिर
अनेक...? क्या दिल्ली में लोगों को सरकार सुख मिलेगा...? या दिल्ली में फिर से लोगों
के सिर पर चुनाव मढ़ दिया जाएगा...? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो हर किसी के ज़हन में कौंध रहा हैं सिर्फ बच्चों को
छोड़ दें तो। दिल्ली मेट्रो में सफर के दौरान लोगों को बात करते सुना कि बीजेपी की
सरकार बन सकती है हांलाकि ये बात और है कि उनके आंकड़े कुछ टूटे फूटे थे। उनके
मुताबिक भाजपा के पास 33 सीटें हैं... पार्टी भी सोचती होगी
की काश ये सच होता... खैर पहले बात जनमत की करते हैं और उसके बाद उसका विश्लेषण भी
करुंगा।
दिल्ली विधानसभा चुनाव में 28 सीटें जीतकर कांग्रेस का सूपड़ा-साफ करने वाली आम आदमी पार्टी (आप) ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का भी सियासी खेल
बिगाड़ दिया है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में
प्रचंड बहुमत के साथ जीत दर्ज कर सरकार बनाने वाली भाजपा दिल्ली में भी 31 सीटें जीतकर नंबर-1 पार्टी बनी, लेकिन सरकार
बनाने के लिए जरूरी 36 सीटों का आंकड़ा
हासिल नहीं कर पाई। कांग्रेस के पास 8 सीटें है जो रेस
में नहीं और अब आप और भाजपा दोनों में से किसी भी पार्टी के पास बहुमत नहीं है। अप्रत्याशित
रूप से आप और भाजपा दोनों ही विपक्ष में बैठने की इच्छा जता रहे
हैं। ऐसे में सवाल यह है कि अगर दोनों सबसे बड़ी पार्टियां विपक्ष में बैठना चाहती
हैं तो दिल्ली में सरकार आखिर कौन बनाएगा?
आईए
कयासों का दौर शुरु करते हैं...
जो संभावना इस माहौल में सबसे ज्यादा चर्चित है वो बीजेपी और आप के साथ आने की है। लेकिन ऐसा होगा संभव नहीं दिखता। कारण ये कि आप पार्टी जिन नैतिक मुल्यों पर खड़ूी है ये फैसला उसके खिलाफ जा सकता है और पार्टी के लिए लोकसभा चुनाव सामने हैं ऐसे में पार्टी इतना बड़ा जोखिम नहीं लेगी। इस समीकरण में एक और बात ये कि कांग्रेस इसे भंजाने में देर नहीं करेगी वो पहले भी कई बार ऐसे आरोप लगा चुकी है कि ये BJP के ही लोग हैं। औऱ रही बात भाजपा की तो पार्टी इंतजार करने के मूड में है...
दूसरा कयास- BJP+CONG
वैसे ये कयास कम मज़ाक ज्यादा है लेकिन कहते हैं सियासत में कोई भी स्थायी दुश्मन नहीं होता। क्या पता दोनों पार्टीयों को इस बात का ख़तरा महसूस हो रहा हो कि उनकी दूकानदारी या यूं कहें कि नूराकुश्ती खतरें में ना पड़ जाए तो चलो हाथ मिला ही लेते हैं लेकिन मेरे हिसाब से इसकी संभावना 0.00001% ही है क्योंकि दोनों अलग विचार धारा की पार्टियां है और बात कांग्रेस की कथित सेक्यूलरिज़्म का भी है।
तीसरा कयास- CONG+AAP
कांग्रेस लगातार संकेत दे रही है कि वो बिना शर्त आप पार्टी को समर्थन देने को तैयार है लेकिन आप सुप्रीमो केजरीवाल किसी भी तरह की संधी के मूड में नहीं है और सवाल फिर से पार्टी के अस्तित्व औऱ नैतिक मुल्यों का भी है। अगर पार्टी ऐसा करने का भूल करती है तो आत्मघाती होगा और पार्टी का वजूद खतरे में पड़ सकता है। साथ ही पार्टी को उम्मीद है कि अगर री पोलिंग हुई तो इसबार बीजेपी का भी सूपड़ा साफ हो जाएगा। आईए विस्तार से समझते हैं
दिल्ली विस चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेता और चुनावी विश्लेषक योगेंद्र यादव ने कहा था कि बहुत सारे वोटरों के दिमाग में यह बात रही कि क्या आप सरकार बना पाएगी? इस वजह से लोग आप के समर्थन में होने के बाद भी वोट देने से डर रहे हैं। योगेंद्र यादव का यह विश्लेषण करीब-करीब सही था, इसे राजनीतिक विश्लेषकों ने भी स्वीकार किया, लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद यह धारणा बदल गई है। आप के सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि पार्टी के ज्यादातर सदस्य फिर से चुनाव चाहते हैं, क्योंकि वह जानते हैं अगला मुकाबला सीधे भाजपा से होगा, जिसका फायदा उन्हें मिलेगा। पार्टी को इस बात का पूरा भरोसा है कि दोबारा चुनाव हुए तो वह भाजपा को भी धूल चटा देगी और प्रचंड बहुमत से सत्ता में आएगी। विस चुनाव के आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं।
दूसरी ओर... अनुभवहीन आप गठबंधन करके फंस जाएगी... क्योंकि गठबंधन की सरकार "अपंग" होती है
आप के नेताओं को एडमिनिस्ट्रेशन का अनुभव नहीं है। दूसरी ओर भाजपा-कांग्रेस इस मामले में मंझे हुए खिलाड़ी हैं। यदि आप इन दोनों में किसी के साथ गठबंधन करती है तो सहयोगी दल उसे तकनीकी पेंचों में फंसाएंगे। वे किसी भी तरह से 'आप' सरकार की छवि धूमिल करने की कोशिश करेंगे। इसके अलावा वे आप को उसके एजेंडे पर काम भी नहीं करने देंगे। कोई भी कानून बनाने के लिए आप को भाजपा या कांग्रेस में से किसी एक पार्टी पर निर्भर रहना होगा।
जनलोकपाल जैसे मुद्दे पर उसे इन दोनों दलों का सहयोग मिलेगा, इसकी उम्मीद बहुत ही कम है। इतना ही नहीं, गठबंधन में आप को सौदेबाजी भी करनी पड़ेगी, जैसे-बाहर से समर्थन देंगे या लेंगे, सरकार में रहेंगे तो मंत्री कौन होगा, अरविंद केजरीवाल कौन सा पद लेंगे? गठबंधन में ऐसे कई सवाल उठेंगे, जिनसे आप की छवि को जबरदस्त धक्का लग सकता है। आखिरकार उन्हें जो जनादेश मिला है, वह उनके राजनीतिक मूल्यों के आधार पर मिला है..
खैर कयासों का दौर जारी है मैने भी एक दो लगा लिए हैं आप क्या कहते हैं...?
धन्यवाद... आपका प्रोत्साहन अपेक्षित रहेगा।

