Tuesday, December 10, 2013

बीमार जनादेश(दिल्ली), क्या बन पाएगी सरकार..?

क्या दिल्ली में नेताओं के इरादे नेक हैं...? या फिर अनेक...? क्या दिल्ली में लोगों को सरकार सुख मिलेगा...या दिल्ली में फिर से लोगों के सिर पर चुनाव मढ़ दिया जाएगा...? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो हर किसी के ज़हन में कौंध रहा हैं सिर्फ बच्चों को छोड़ दें तो। दिल्ली मेट्रो में सफर के दौरान लोगों को बात करते सुना कि बीजेपी की सरकार बन सकती है हांलाकि ये बात और है कि उनके आंकड़े कुछ टूटे फूटे थे। उनके मुताबिक भाजपा के पास 33 सीटें हैं... पार्टी भी सोचती होगी की काश ये सच होता... खैर पहले बात जनमत की करते हैं और उसके बाद उसका विश्लेषण भी करुंगा।
दिल्‍ली विधानसभा चुनाव में 28 सीटें जीतकर कांग्रेस का सूपड़ा-साफ करने वाली आम आदमी पार्टी (आप) ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का भी सियासी खेल बिगाड़ दिया है। राजस्‍थान, मध्‍य प्रदेश और छत्‍तीसगढ़ में प्रचंड बहुमत के साथ जीत दर्ज कर सरकार बनाने वाली भाजपा दिल्‍ली में भी 31 सीटें जीतकर नंबर-1 पार्टी बनी, लेकिन सरकार बनाने के लिए जरूरी 36 सीटों का आंकड़ा हासिल नहीं कर पाई। कांग्रेस के पास  8 सीटें है जो रेस में नहीं और अब आप और भाजपा दोनों में से किसी भी पार्टी के पास बहुमत नहीं है। अप्रत्‍याशित रूप से आप और भाजपा दोनों ही विपक्ष में बैठने की इच्‍छा जता रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि अगर दोनों सबसे बड़ी पार्टियां विपक्ष में बैठना चाहती हैं तो दिल्‍ली में सरकार आखिर कौन बनाएगा
आईए कयासों का दौर शुरु करते हैं...




पहला कयास- BJP+AAP
जो संभावना इस माहौल में सबसे ज्यादा चर्चित है वो बीजेपी और आप के साथ आने की है। लेकिन ऐसा होगा संभव नहीं दिखता। कारण ये कि आप पार्टी जिन नैतिक मुल्यों पर खड़ूी है ये फैसला उसके खिलाफ जा सकता है और पार्टी के लिए लोकसभा चुनाव सामने हैं ऐसे में पार्टी इतना बड़ा जोखिम नहीं लेगी। इस समीकरण में एक और बात ये कि कांग्रेस इसे भंजाने में देर नहीं करेगी वो पहले भी कई बार ऐसे आरोप लगा चुकी है कि ये BJP के ही लोग हैं। औऱ रही बात भाजपा की तो पार्टी इंतजार करने के मूड में है...
दूसरा कयास- BJP+CONG
वैसे ये कयास कम मज़ाक ज्यादा है लेकिन कहते हैं सियासत में कोई भी स्थायी दुश्मन नहीं होता। क्या पता दोनों पार्टीयों को इस बात का ख़तरा महसूस हो रहा हो कि उनकी दूकानदारी या यूं कहें कि नूराकुश्ती खतरें में ना पड़ जाए तो चलो हाथ मिला ही लेते हैं लेकिन मेरे हिसाब से इसकी संभावना 0.00001% ही है क्योंकि दोनों अलग विचार धारा की पार्टियां है और बात कांग्रेस की कथित सेक्यूलरिज़्म का  भी है।
 
तीसरा कयास- CONG+AAP
कांग्रेस लगातार संकेत दे रही है कि वो बिना शर्त आप पार्टी को समर्थन देने को तैयार है लेकिन आप सुप्रीमो केजरीवाल किसी भी तरह की संधी के मूड में नहीं है और सवाल फिर से पार्टी के अस्तित्व औऱ नैतिक मुल्यों का भी है। अगर पार्टी ऐसा करने का भूल करती है तो आत्मघाती होगा और पार्टी का वजूद खतरे में पड़ सकता है। साथ ही पार्टी को उम्मीद है  कि अगर री पोलिंग हुई तो इसबार बीजेपी का भी सूपड़ा साफ हो जाएगा। आईए विस्तार से समझते हैं 
दिल्‍ली विस चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी के वरिष्‍ठ नेता और चुनावी विश्‍लेषक योगेंद्र यादव ने कहा था कि बहुत सारे वोटरों के दिमाग में यह बात रही कि क्‍या आप सरकार बना पाएगी? इस वजह से लोग आप के समर्थन में होने के बाद भी वोट देने से डर रहे हैं। योगेंद्र यादव का यह विश्‍लेषण करीब-करीब सही था, इसे राजनीतिक विश्‍लेषकों ने भी स्‍वीकार किया, लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद यह धारणा बदल गई है। आप के सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि पार्टी के ज्‍यादातर सदस्‍य फिर से चुनाव चाहते हैं, क्‍योंकि वह जानते हैं अगला मुकाबला सीधे भाजपा से होगा, जिसका फायदा उन्‍हें मिलेगा। पार्टी को इस बात का पूरा भरोसा है कि दोबारा चुनाव हुए तो वह भाजपा को भी धूल चटा देगी और प्रचंड बहुमत से सत्‍ता में आएगी। विस चुनाव के आंकड़े भी इसकी तस्‍दीक करते हैं।

दूसरी ओर... अनुभवहीन आप गठबंधन करके फंस जाएगी... क्योंकि गठबंधन की सरकार "अपंग" होती है
 
आप के नेताओं को एडमिनिस्‍ट्रेशन का अनुभव नहीं है। दूसरी ओर भाजपा-कांग्रेस इस मामले में मंझे हुए खिलाड़ी हैं। यदि आप इन दोनों में किसी के साथ गठबंधन करती है तो सहयोगी दल उसे तकनीकी पेंचों में फंसाएंगे। वे किसी भी तरह से 'आप' सरकार की छवि धूमिल करने की कोशिश करेंगे। इसके अलावा वे आप को उसके एजेंडे पर काम भी नहीं करने देंगे। कोई भी कानून बनाने के लिए आप को भाजपा या कांग्रेस में से किसी एक पार्टी पर निर्भर रहना होगा।
 
जनलोकपाल जैसे मुद्दे पर उसे इन दोनों दलों का सहयोग मिलेगा, इसकी उम्‍मीद बहुत ही कम है। इतना ही नहीं, गठबंधन में आप को सौदेबाजी भी करनी पड़ेगी, जैसे-बाहर से समर्थन देंगे या लेंगे, सरकार में रहेंगे तो मंत्री कौन होगा, अरविंद केजरीवाल कौन सा पद लेंगे? गठबंधन में ऐसे कई सवाल उठेंगे, जिनसे आप की छवि को जबरदस्‍त धक्‍का लग सकता है। आखिरकार उन्‍हें जो जनादेश मिला है, वह उनके राजनीतिक मूल्‍यों के आधार पर मिला है..

खैर कयासों का दौर जारी है मैने भी एक दो लगा लिए हैं आप क्या कहते हैं...?

धन्यवाद... आपका प्रोत्साहन अपेक्षित रहेगा।


 

Monday, September 30, 2013

नक़सान हुआ फ़ायदों से अधिक। "मंडल कमिशन"

मंडल कमीशन रिपोर्ट को लागू करना करना हिंदुस्तान की राजनीति में 40 वर्ष की एक प्रक्रिया का नतीजा था और एक बड़ी क्रांतिकारी घटना थी.

उसने देश की राजनीति में बहुत बड़ी तब्दीलियाँ लाने की संभावनाएं पैदा की थीं क्योंकि मंडल कमीशन की 12 सिफारिशें थीं. एक सिफारिश थी कि नौकरियों में आरक्षण दिया जाए. लेकिन बाक़ी 11 सिफारिशें बुनियादी तब्दीली की थी.
उसमें कहा गया था कि भूमि सुधार होना चाहिए, शिक्षा व्यवस्था बदलनी चाहिए और प्रशासन को बदलना चाहिए.
जब रिपोर्ट मान ली गई, तो समझा गया कि समूची रिपोर्ट मान ली जाएगी और उसको चुनिंदा तरीके से कार्यान्वित किया जाएगा. लेकिन दुर्भाग्य है कि उसके मात्र एक सुझाव जो नौकरियों में आरक्षण की थी, उसी पर ज़ोर दिया गया.
नतीजा ये हुआ कि वो सब क्राँतिकारी संभावनाएँ थीं वह सब बुझ गई.
मंडल कमीशन की रिपोर्ट को जाति केंद्रित व्यवस्था के विरोध में माना जाता है. माना जाता है कि कोशिश जाति को हिंदुस्तान की व्यवस्था से अलग करने की थी.
वह उद्देश्य जो लोहिया ने बताया, जो जयप्रकाश ने कहा और गाँधीजी चाहते थे कि हिंदुस्तान में जाति तो नहीं होनी चाहिए. काका कालेलकर आयोग के अध्यक्ष थे और उन्होंने कहा कि हम जाति के आधार पर पिछड़े वर्गां को आरक्षण नहीं देंगे.
कालेलकर की रिपोर्ट जब आई तो बाक़ी लोग चाहते थे कि आरक्षण के लिए जाति के आधार लिए जाने चाहिए. 1955 से लेकर 1978 तक मामला इसी बात पर रूका रहा कि हमें जाति के आधार पर हमें आरक्षण देना चाहिए या नहीं.
1977 में आई तो फिर यह मामला उठा और मंडल कमीशन बनाया गया.
लेकिन वो चुनावी राजनीति के दबाव में थे और दूसरे वे बहुत जल्दी में थे. उन्होंने 1980 में जब अपनी रिपोर्ट सौंपी तो उन्होंने इसे एकतरफ़ा अंतिम रुप दे दिया था और दूसरे इसे सौंपते हुए उन्होंने कहा, "मैं इसका विसर्जन कर रहा हूँ." शायद वो जानते थे कि ये लागू नहीं होगी.
दबाव और जल्दबाज़ी
मूलभूत तब्दिलियों की दिशा में ले जानी वाली इस रिपोर्ट को लागू करने के लिए जनता दल के लोगों ने वीपी सिंह पर बहुत दबाव डाला.
6 अगस्त 1990 को साढ़े पाँच बजे एक बैठक हुई. तो उसमें वीपी सिंह ने कहा, "मैं सबसे पहले मंडल कमीशन पर बात करना चाहता हूँ."
 वीपी सिंह ने रामविलास पासवान से कहा कि वे चर्चा शुरु करें. और पासवान जो एक दलित थे, ने पिछड़ों को आरक्षण देने के विषय पर चर्चा शुरु की और शरद यादव ने इसका ज़ोरदार समर्थन किया
सचिवालय के जितने लोग थे उतने लोग हैरान थे. वहाँ बीजी देशमुख थे और विनोद पांडे थे.
वीपी सिंह ने रामविलास पासवान से कहा कि वे चर्चा शुरु करें. और पासवान जो एक दलित थे, ने पिछड़ों को आरक्षण देने के विषय पर चर्चा शुरु की और शरद यादव ने इसका ज़ोरदार समर्थन किया.
अजीत सिंह ने कहा कि अगर आप करना चाहते हैं तो जाटों को भी दे दीजिए.
लेकिन कुछ लोगों ने जैसे कि मुफ्ती मोहम्मद ने कहा कि थोड़ा और समय ले लीजिए.
लेकिन वीपी सिंह ने कहा कि नहीं इस पर अभी चर्चा करना है और कुछ घंटों के बाद इस लागू कर दिया गया.
ये वरिष्ठ नौकरशाह बीजी देशमुख के की स्वीकारोक्ति है.
बाद में जो पता चला उससे पता चलता है कि देवीलाल को पार्टी से निकालने के लिए एक राजनैतिक सौदेबाज़ी में मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने का फ़ैसला किया गया.
विडंबना
एक ऐसा बुनियादी दस्तावेज़ जिसमें बुनियादी तब्दीली की बात की थी राजनीतिक दबाव में एकाएक सात अगस्त को स्वीकार कर लिया गया और अगले दिन उसको संसद में पेश भी कर दिया गया.
मंडल का जो रेडिकल रूप था वह राजनीति में आ करके थोड़ा सा विकृत हो गया. इसलिए सिर्फ़ आरक्षण नौकरियों पर ही रहा बाकी चीज़ों के लिए पिछले 15 वर्षों में कुछ नहीं हुआ. देश की राजनीति का मंडलीकरण ग़लत हुआ है.
मुलायम सिंह यादव
पिछड़े वर्ग के नेता भी अगड़े वर्ग के किसी नेता जैसी ही व्यवस्था के साथ काम कर रहे हैं
मंडल के आधार पर होता तो मंडलीकरण ठीक होता, लेकिन मंडलीकरण दूसरी तरफ चला गया. इसकी एक वजह थी.
1955 से 1990 तक जो राजनीतिक वर्ग था वह ओबीसी को आरक्षण देने में भी विरोध करता था.
श्रीमती इंदिरा गाँधी कहा करती थीं कि इसकी क्या ज़रूरत है यह तो बैसाखी है, हमको तो मैरिट देखना चाहिए, राजीव गाँधी का बिलकुल एलानिया विरोध था मंडल कमीशन की रिपोर्ट पर. इसलिए उन्होंने दस साल टाल दिया.
इसलिए हिंदुस्तान का जो उच्च वर्ग था, राजनीतिक वर्ग था वो पिछड़ों को आरक्षण के विरोध में ही रहा है.
1955 से लेकर के 1990 तक उत्तरप्रदेश और बिहार में एक मध्यमर्ग पैदा हो गया था.वो डॉक्टर बन गए, वकील बन गए वो राजनीति में आ गए. जनता दल बन गया. तो उस क्लास का दबाव था.
तो इस वर्ग के दबाव में मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू किया गया लेकिन उतना ही कार्यान्वित किया गया जितना उस क्लास को ज़रूरत थी.
वे सत्ता में भागीदारी के लिए आरक्षण चाहते थे.
सत्ता में भागीदारी की इस इच्छा की वजह से जो मंडल कमीशन की बुनियादी तब्दीली की बातें थीं वो कहीं और गुम हो गईं.
पिछले 15 वर्ष में हिंदुस्तान में मंडल की जो अनुशंसाएँ थीं वो पीछे रह गईं और जातिवाद उभरकर सामने आ गईं.
पिछड़ा वर्ग के जितने तबके हैं उसकी हालत ये है कि जो कि अब पिछड़ा वर्ग के भीतर जो उच्च वर्ग है वह पिछड़े वर्ग के ही निम्न वर्ग को दबाए रखता है. इस तरह से एक वर्ग के भीतर ही अब विभाजन हो गया है.
अब आर्थिक पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने की मांग हो रही है.
 पिछड़ा वर्ग के उच्च वर्ग का जो दबाव है वह अगड़े वर्ग के दबाव से बिलकुल भी अलग नहीं है
इस तरह लगता है कि मंडल ने जिस पिछड़े वर्ग के फ़ायदे की बात की थी दरअसल उनका नुक़सान हुआ है.
जाति व्यवस्था हिंदुस्तान में और मजबूत हो गई है. 1980 के दशक के बाद बिहार में लालू प्रसाद, राजस्थान में गहलौत, उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह जैसे नेता उभरे हैं.
इन सबके राजनीतिक संबंध हैं वह बड़े व्यापारी घरानों के साथ हैं. इनकी पार्टी की जो व्यवस्था है वह व्यक्तिवाद या परिवारवाद की है और ये से अलग लोगों को संरक्षण दे रहे हैं.
इसलिए पिछड़ा वर्ग के उच्च वर्ग का जो दबाव है वह अगड़े वर्ग के दबाव से बिलकुल भी अलग नहीं है.
आज 15 वर्ष के बाद हिंदुस्तान में मंडल कमीशन का जो नुकसान हुआ है उसके फायदों से अधिक है.

सभार: BBC HINDI

''वी मिस यू लालू जी''

कभी हंसते लालू... कभी चिढ़ते लालू.... कभी टांय टांय बोलते लालू.... रेल बजट को भी रोचक बनाने में माहिर लालू... राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, राजनीति में एक ऐसा नाम जिसे कुछ सियासत का मसखरा कहते हैं तो कुछ शातिर सियासी खिलाड़ी.... लेकिन एक बहुत बड़ा तबका ऐसा भी है जो उन्हें गरीबों का नेता मानता है.... भोली सूरत, आंखों में दुश्मनों को धूल चटाने की जज्बा, जुबान ऐसी कि विरोधी कि बोलती बंद हो जाए... वाकई ये उनकी करिश्माई शैली ही है... संसद में रहते थे तो रौनक बनाए रखते थे... गोपालगंज के बेहद ही गरीब परिवार में पैदा हुए लालू सिर्फ अपने दम पर बिहार के मुख्यमंत्री बने और बाद में देश के रेलमंत्री भी बने... लेकिन कहते हैं आपके कर्मो का हिसाब आपको यही देना पड़ता है... लालू जी के साथ ठीक ऐसा ही हुआ है... राजयोग भोगने के बाद अब इस बुढ़ापे में जेलयोग का लुत्फ उठाएंगे... वैसे उन्हे भी इल्म रहा होगा कि उनका राजनीतिक करियर अब ढलान पर है... बिहार की जनता ने उन्हे पहले ही नकार दिया था... ये लालू का डाउनफॉल ही था कि बाद में उनके अपनों ने भी साथ छो़डा और अब केंद्र की सत्तासीन या यूं कहें की  सबसे बड़ी पार्टी ने जिनका की लालू ने बिना उफ किए दस साल साथ निभाया उसने भी चाय से मक्खी की तरह उन्हें निकाल कर फेंक दिया... वैसे लालू की भाषा में इसे फिरकापरस्त राजनीति कहते हैं... खैर उनपर कानून का डंडा को चलना ही था... चलिए आपको बताते हैं कि गोपालगंज का एक लालू कैसे बना देश का लालू...


एक वीडियो उनके नाम...

बिहार के गोपालगंज जिले के फुलवरिया गांव में 11 जून 1948 को पैदा हुए लालू ने राजनीति की शुरुआत पटना के बीएन कॉलेज से की थी.. तब लालू 1970 में पटना विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के महासचिव चुने गए थे यही लालू का पहला पड़ाव भी था.. इसके बाद छात्र आंदोलन के दौरान लालू की सियासत में दिलचस्पी और बढ़ती गई.... माहौल को भांपने में माहिर लालू ने राम मनोहर लोहिया और आपातकाल के नायक जय प्रकाश नारायण का समर्थक बनकर पिछड़ी जातियों में अपनी छवि बनानी शुरू कर दी... नतीजा ये कि महज 29 साल की उम्र में 1977 में वो पहली बार संसद पहुंच गए... अपनी जन सभाओं में लालू 1974 की संपूर्ण क्रांति का नारा दोहराते रहे... लोगों को सपने दिखाते रहे...वाक शैली में लालू को महारत हासिल थी और यही वजह भी रही की एक वक्त ऐसा भी आया कि लालू को ग़रीबों का मसीहा कहा जाने लगा, नारे दिए गए "जब तक रहेगा आलू, तबतक रहेगा लालू" । ये 90 का दशक था औऱ लालू अपने चरम पर पहुंच रहे थे.... जनता की नब्ज पकड़ते हुए लालू ने 90 के दशक में मंडल कमीशन की लहर पर सवार होकर बिहार की सत्ता पर कब्जा कर लिया... बिहार में लालू यादव को जितना समर्थन मिला था शायद उतना समर्थन राजनीति में अभी तक किसी को नही मिला होगा ना मिलेगा....  लालू को उस वक्त अति पिछड़े और बाकी लोगों का काफी वोट मिला.... लेकिन सत्ता में रहते हुए लालू अपने मकसद से भटक गए... पहले से ही पिछड़ा बिहार अब और बर्बाद होने लगा... घोटाले, अपराध, अपहरण, वसूली ये सब लालू की सरकार का दूसरा नाम बन गए... 27 जनवरी, 1996 को पश्चिम सिंहभूम ज़िले के चायबासा में पशुधन विभाग पर मारे गए एक छापे के बाद चारा घोटाला सामने आया.. इस मामले में शिवानंद तिवारी, सरयू रॉय, राजीव रंजन सिंह और रविशंकर प्रसाद ने पटना हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की... पटना हाईकोर्ट ने 11 मार्च 1996 को 950 करोड़ रुपए के कथित चारा घोटाले के मामलों की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया था... इस घोटाले का ज़िक्र ज़्यादा हो गया मामला जो सुर्ख़ियों में हैं... खैर इसके बाद उनपर साल 2000 में आय से ज्यादा संपत्ति का आरोप लगा... इन आरोपों के बीच जब लालू ने जेल जाते वक्त सत्ता राबड़ी को सौंपी तो भी कई सवाल उठे... लेकिन लालू ने कभी उसकी परवाह नहीं की... राज्य में विकास पर ब्रेक लगा और तरक्की सिर्फ लूट, हत्या के मामलों में अपहरण उद्योग की हुई... नतीजा ये कि 2005 में बिहार की जनता ने लालू को सत्ता से बाहर कर दिया। हालांकि इस बीच 2004 से 2009 तक लालू ने रेल मंत्रालय की कमान संभाली... विदेश तक में नाम कमाया... लेकिन अपने आप को किंगमेकर और किंगपिन कहने वाले लालू अब जेल में हैं... औऱ अब कहने में ये अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए कि संसद में शायद ही लालू प्रसाद यादव का वो बेबाक अंदाज़ नज़र आए...

''वी मिस लालू जी''

Wednesday, September 4, 2013

जनता पर बोझ, नेताओं की मौज

तेल के दाम लगातार बढ़ाए जा रहे हैं और अब सरकार पिर से गैस के दाम बढ़ाने पर विचार कर रही है।
मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि प्रति सिलेंडर हर माह 50 रुपए का इजाफा करके सरकार एक साल में 1016 करोड़ रुपए की बचत कर सकेगी। इस अधिकारी ने कहा कि अपने ग्राहक को जानिए और रियायती सिलेंडर का पैसा सीधे आपके खाते में योजना के अलावा इस बढ़ोतरी के जरिए सरकार ने एक साल में करीब 5-6 हजार करोड़ रुपए की बचत का लक्ष्य रखा है। 
लेकिन इस आर्थिक तंगी में मंत्री व सांसद अपने खर्चों में कटौती को तैयार नहीं है। कई मंत्रालयों में छह से ज्यादा कारें अटैच हैं। वहीं अमूमन हरेक मंत्रालय में कम से कम दो कारें जरूर हैं। इनमें पेट्रोल व डीजल पर आने वाला खर्च लाखों रुपए में है। मंत्री खुद एक गाड़ी प्रयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त पीएस, एपीएस और कहीं-कहीं तो पीए व अन्य छोटे कर्मचारी भी सरकारी गाड़ी का मजा लेते हैं। कुछ तो अपने बच्चों को स्कूल छोडऩे से लेकर बाजार हाट तक के लिए सरकारी गाड़ी का ही इस्तेमाल करते हैं। 
हर मंत्रालय में शाहखर्ची: करीब तीन साल पहले के रिकॉर्ड के मुताबिक यानी वर्ष 2009-10 और 2010-11 के दौरान आईटी महकमे में दो साल के पेट्रोल व डीजल का खर्च 37 लाख 30 हजार रुपए से 'यादा था। ग्रामीण विकास मंत्रालय में दो सालों में खर्च हुए करीब 17 लाख 16 हजार रुपए। विदेश मंत्रालय में तीन मंत्रियों को सात कारें दी गई थीं। इनका खर्च था दो साल में 16 लाख 51 हजार रुपए से अधिक। 
टेलीकॉम के पास दो कारें सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक थीं और खर्च था दो साल में 15 लाख 84 हजार रुपए से 'यादा। गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोत मंत्रालय जैसे महत्वहीन महकमे में भी गाडिय़ों पर 15 लाख रुपए से 'यादा की राशि खर्च हो गई। स्वास्थ्य व गृहमंत्रालय का खर्च भी इसके आसपास था। सूत्रों के मुताबिक यह खर्च कम होने के बजाए बढ़ा है। सरकारी खर्चों पर कटौती का कोई ठोस प्लान सरकार के पास नहीं है। 

मनमोहन सिंह
पीएम के काफिले में 10 गाड़ियां (इनमें सुरक्षा में तैनात गाड़ियां शामिल नहीं हैं)। 
इनमें दो बीएमडब्लू सीरीज 7 सेडांस कारों के अलावा 6 बीएमडब्लू एक्स 3 कार, 1 जैमर लगी टाटा सफारी और 1 मर्सिडीज बेंज एंबुलेंस।  

सोनिया गांधी 
काफिले में 4-5 गाड़ियां। 
4 टाटा सफारी, 1 रेंज रोवर। 

लालकृष्ण आडवाणी 

काफिले में 6 गाड़ियां। 
1 बुलेटप्रूफ एंबेसडर, 4 एंबेसडर और 1 जैमर लगी टाटा सफारी।  
1 जैमर लगी टाटा सफारी 

प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर बादल 

पंजाब के सीएम और डिप्टी सीएम। 
51 गाड़ियां। 
बादल पिता-पुत्र बुलेटप्रूफ टोयोटा लैंड क्रूजर में चलते हैं। सुखबीर बादल के काफिले में मुख्यमंत्री के काफिले से आमतौर पर ज्यादा गाड़ियां होती हैं।

जे. जयललिता 
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री।  
20 गाड़ियां। 
जयललिता के काफिले में बुलेट प्रूफ एसयूवी शामिल। दो गाड़ियों पर मोबाइल जैमर लगे होते हैं। दो एस्कॉर्ट कार। ४ पायलट कार। एक एंबुलेंस और मीडिया वालों की एक कार। 

अखिलेश यादव 
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री। 
20 गाड़ियां। 
अखिलेश एसयूवी या एंबेसडर कार में चलते हैं। जब वे किसी जिले के दौरे पर होते हैं तो उनके काफिले में गाड़ियों की संख्या बढ़कर 30 हो जाती है।

भूपिंदर सिंह हूडा 
हरियाणा के मुख्यमंत्री।  
25 गाड़ियां। 
हूडा के काफिले में 24 फोर्ड एंडेवर गाड़ियां शामिल। खुद हूडा ह्युंदै सेंटा फे से चलते हैं। 

उमर अब्दुल्ला 
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री। 
10-25 गाड़ियां। 
अब्दुल्ला के काफिले में एक पायलट कार, 4 एस्कॉर्ट गाड़ियां (इनमें से ज्यादातर महिंद्रा स्कॉर्पियो), २ टाटा सफारी, एक रेंज रोवर, जैमर से सजी एक एसयूवी और एक एंबुलेस। 

नरेंद्र मोदी 
गुजरात के मुख्यमंत्री। 
10-12 गाड़ियां। 
नरेंद्र मोदी के काफिले में 9 महिंद्रा स्कॉरपियो, एक एंबुलेंस, एक अग्निशमन वाहन और एक विस्फोटक जांच करने वाली गाड़ी शामिल है। 

नीतीश कुमार 
बिहार के मुख्यमंत्री। 
12 गाड़ियां। 
नीतीश आम तौर पर एंबेसडर कार में चलते हैं। सिर्फ लंबी दूरी के लिए वे एसयूवी का इस्तेमाल करते हैं। उनके काफिले में एक अतिरिक्त एंबेसडर कार होती है जिसे पहली एंबेसडर के खराब होने की स्थिति में इस्तेमाल किया जा सके। काफिले में बाकी 10 गाड़ियों में सुरक्षा कर्मी और मीडिया वाले सफर करते हैं।  


पृथ्वीराज चव्हाण 
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री। 
6 गाड़ियां। 
चव्हाण एक बुलेट प्रूफ टाटा सफारी में चलते हैं। तीन महिंद्रा स्कॉरपियो एसयूवी और पुलिस जिप्सी उनकी सुरक्षा में तैनात है

शिवराज सिंह चौहान 
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री। 
6 गाड़ियां। 
शिवराज सिंह चौहान शेवरले की कैप्टिवा में सफर करते हैं। उनके काफिले में एक जिप्सी शामिल होती है, जिसे पायलट कार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा चार एंबेसडर कार भी शामिल होती है।

Thursday, January 31, 2013

आज़ाद आवाज़ पर पहरा है... (कमल हासन)

कमल हासन
देश में सरेआम, आवाम से आवाज... कलाकार से कला... तंत्र से लोक को अलग किया जा रहा है....  यानी लोकतंत्र अब हाशिए पर है... हाल के महीनों में अन्ना की लड़ाई देखी, रामदेव का हुंकार भी देखा... इंडिया गेट पर बिना नेता वाला विरोध देखा... अब एक कलाकार की दहाड़ देख रहा हूं.... कमाल के अभिनेता औऱ कई राष्ट्रीय फिल्म विजेता कमल हासन इन दिनों अपने और अपने फिल्म के वजूद के लिए सियासी लकड़बग्घों से उलझे हुए हैं... वो चाहते थे कि जिस शिद्दत के साथ ये फिल्म बनाई गई है उसी जोश के साथ इसे सिनेमाघरों में दर्शक सराहें.. लेकिन शिकार की फिराक में बैठा सियासी होशियारों का झुंड ने कमल पर हमला बोल दिया... गौरतलब है कि 'विश्वरूपम' का तमिल और तेलुगू संस्करण 25 जनवरी को रिलीज होना था लेकिन कुछ मुस्लिम संगठनों की शिकायत पर तमिलनाडु सरकार ने एक दिन पहले ही दो हफ्तों के लिए इस फिल्म को प्रदर्शित करने पर प्रतिबंध लगा दिया था.शिकायत की गई थी कि फिल्म के कुछ दृश्यों में संप्रदाय विशेष को गलत ढंग से चित्रित किया गया है. इससे पहले 'विश्वरूपम' मंगलवार को कर्नाटक के सिनेमाघरों में पुलिस सुरक्षा के बीच प्रदर्शित की गई थी. 95 करोड़ रुपये की लागत से बनी यह फिल्म 25 जनवरी को रिलीज हुई थी लेकिन पहले शो के बाद इसके प्रदर्शन पर प्रतिबंध लग गया था. अब ज़रा फ़र्ज़ कीजिए कि एक इंसान से उसकी जीने आज़ादी छीन ली जाए तो उसपर क्या गुज़रेगी... एक चित्रकार से उसका ब्रश छीन लिया जाए तो क्या वो जी पाएगा... एक गायक की आवाज पर पाबंदी लगा दी जाए तो क्या होगा.... ये तमाम सवाल वैसे ही हैं जैसे कमल हासन औऱ उनकी फिल्म पर उपजा विवाद है...  सविंधआन की धारा 15(ए) के मुताबिक़ हर इंसान को अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार है... लेकिन जो दिख रहा है वो संविधान के नियमों को भी दरकिनार कर रहा है... धर्म के नाम पर फिल्म से खिलवाड़ करने वाले लोग क्या खुद धर्म का बखूबी पालन कर रहे होंगे... मजहब को केंद्र बनाकर हमसे हमारा हक़ छीनने वाले ये भूल रहे हैं कि आने वाला वक्त हमारा है... जिसमें ये सारे पैंतरे धरे के धरे रह जाएंगे... वैसे भी विवाद खड़ा करने के बाद कंबल ओढ़ के घी पीने की आदत हमारे नेताओं की पुरानी रही है.... वो तो शुक्र है कि आज बापू औऱ सरदार पटेल जैसे नेता हमारे बीच नहीं है नहीं तो सादा कुर्ता और खाकी कोट का ये बदनुमा चेहरा देख कर वो भी रो पड़ते...  बहरहाल अब खबर ये भी है कि कमल हासन की विवादस्पद फिल्म ‘विश्वरूपम’ पर केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी कानून में बदलाव कर सकते हैं... सूत्रों के मुताबिक एक्ट में संशोधन के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय एक समिति का गठन करने जा रहा है... सरकार ऐसी अपीलेट बॉडी गठित करना चाहती है जहां राज्य सरकारें अपील कर सकें...  तिवारी जी का कहना है कि अब समय आ गया है कि सिनेमेटोग्राफी एक्ट में संशोधन किया जाए ताकि राज्य सरकारें सेंसर बोर्ड की ओर से जारी प्रमाण पत्र पर सवाल खड़े न कर सकें... नहीं तो हर राज्य के लिए अपना सेंसर बोर्ड हो... लेकिन मनीष जी ये बताएं सत्ता की चाबी जिन लोगों के हाथ में हैं या रहेगी ये कानून उनके लिए कितना कारगर होगा... जवाब आप औऱ हम दोनों बखूबी जानते हैं...