कभी हंसते लालू... कभी चिढ़ते लालू.... कभी टांय टांय बोलते लालू.... रेल बजट को भी रोचक बनाने में माहिर लालू... राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, राजनीति में एक ऐसा नाम जिसे कुछ सियासत का मसखरा कहते हैं तो कुछ शातिर सियासी खिलाड़ी.... लेकिन एक बहुत बड़ा तबका ऐसा भी है जो उन्हें गरीबों का नेता मानता है.... भोली सूरत, आंखों में दुश्मनों को धूल चटाने की जज्बा, जुबान ऐसी कि विरोधी कि बोलती बंद हो जाए... वाकई ये उनकी करिश्माई शैली ही है... संसद में रहते थे तो रौनक बनाए रखते थे... गोपालगंज के बेहद ही गरीब परिवार में पैदा हुए लालू सिर्फ अपने दम पर बिहार के मुख्यमंत्री बने और बाद में देश के रेलमंत्री भी बने... लेकिन कहते हैं आपके कर्मो का हिसाब आपको यही देना पड़ता है... लालू जी के साथ ठीक ऐसा ही हुआ है... राजयोग भोगने के बाद अब इस बुढ़ापे में जेलयोग का लुत्फ उठाएंगे... वैसे उन्हे भी इल्म रहा होगा कि उनका राजनीतिक करियर अब ढलान पर है... बिहार की जनता ने उन्हे पहले ही नकार दिया था... ये लालू का डाउनफॉल ही था कि बाद में उनके अपनों ने भी साथ छो़डा और अब केंद्र की सत्तासीन या यूं कहें की सबसे बड़ी पार्टी ने जिनका की लालू ने बिना उफ किए दस साल साथ निभाया उसने भी चाय से मक्खी की तरह उन्हें निकाल कर फेंक दिया... वैसे लालू की भाषा में इसे फिरकापरस्त राजनीति कहते हैं... खैर उनपर कानून का डंडा को चलना ही था... चलिए आपको बताते हैं कि गोपालगंज का एक लालू कैसे बना देश का लालू...
एक वीडियो उनके नाम...
बिहार के गोपालगंज जिले के फुलवरिया गांव में 11 जून 1948 को पैदा हुए लालू ने राजनीति की शुरुआत पटना के बीएन कॉलेज से की थी.. तब लालू 1970 में पटना विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के महासचिव चुने गए थे यही लालू का पहला पड़ाव भी था.. इसके बाद छात्र आंदोलन के दौरान लालू की सियासत में दिलचस्पी और बढ़ती गई.... माहौल को भांपने में माहिर लालू ने राम मनोहर लोहिया और आपातकाल के नायक जय प्रकाश नारायण का समर्थक बनकर पिछड़ी जातियों में अपनी छवि बनानी शुरू कर दी... नतीजा ये कि महज 29 साल की उम्र में 1977 में वो पहली बार संसद पहुंच गए... अपनी जन सभाओं में लालू 1974 की संपूर्ण क्रांति का नारा दोहराते रहे... लोगों को सपने दिखाते रहे...वाक शैली में लालू को महारत हासिल थी और यही वजह भी रही की एक वक्त ऐसा भी आया कि लालू को ग़रीबों का मसीहा कहा जाने लगा, नारे दिए गए "जब तक रहेगा आलू, तबतक रहेगा लालू" । ये 90 का दशक था औऱ लालू अपने चरम पर पहुंच रहे थे.... जनता की नब्ज पकड़ते हुए लालू ने 90 के दशक में मंडल कमीशन की लहर पर सवार होकर बिहार की सत्ता पर कब्जा कर लिया... बिहार में लालू यादव को जितना समर्थन मिला था शायद उतना समर्थन राजनीति में अभी तक किसी को नही मिला होगा ना मिलेगा.... लालू को उस वक्त अति पिछड़े और बाकी लोगों का काफी वोट मिला.... लेकिन सत्ता में रहते हुए लालू अपने मकसद से भटक गए... पहले से ही पिछड़ा बिहार अब और बर्बाद होने लगा... घोटाले, अपराध, अपहरण, वसूली ये सब लालू की सरकार का दूसरा नाम बन गए... 27 जनवरी, 1996 को पश्चिम सिंहभूम ज़िले के चायबासा में पशुधन विभाग पर मारे गए एक छापे के बाद चारा घोटाला सामने आया.. इस मामले में शिवानंद तिवारी, सरयू रॉय, राजीव रंजन सिंह और रविशंकर प्रसाद ने पटना हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की... पटना हाईकोर्ट ने 11 मार्च 1996 को 950 करोड़ रुपए के कथित चारा घोटाले के मामलों की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया था... इस घोटाले का ज़िक्र ज़्यादा हो गया मामला जो सुर्ख़ियों में हैं... खैर इसके बाद उनपर साल 2000 में आय से ज्यादा संपत्ति का आरोप लगा... इन आरोपों के बीच जब लालू ने जेल जाते वक्त सत्ता राबड़ी को सौंपी तो भी कई सवाल उठे... लेकिन लालू ने कभी उसकी परवाह नहीं की... राज्य में विकास पर ब्रेक लगा और तरक्की सिर्फ लूट, हत्या के मामलों में अपहरण उद्योग की हुई... नतीजा ये कि 2005 में बिहार की जनता ने लालू को सत्ता से बाहर कर दिया। हालांकि इस बीच 2004 से 2009 तक लालू ने रेल मंत्रालय की कमान संभाली... विदेश तक में नाम कमाया... लेकिन अपने आप को किंगमेकर और किंगपिन कहने वाले लालू अब जेल में हैं... औऱ अब कहने में ये अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए कि संसद में शायद ही लालू प्रसाद यादव का वो बेबाक अंदाज़ नज़र आए... ''वी मिस लालू जी''
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