अरुंधती और गिलानी में फर्क क्या ... ?
अरुंधती रॉय के एक बयान ने देश के लोगो को उस समय एक बड़ा झटका दिया जब उसने कश्मीर को देश का हिस्सा मानने से इनकार कर दिया उन्होंने कहा है कि कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा रहा ही नहीं है। अरुंधती रॉय को देश में एक बुद्धिजीवी के तौर पर देखा जाता है लेकिन उनके इस बयान ने कश्मीर की रक्षा में लगे नौजवानों को ज़रूर निराश किया है . अब हर भारत वासी के ज़ेहन में एक ही सवाल उठता है की गिलानी और अरुंधती में फर्क क्या है...
पहले जानते है कश्मीर को ....
चौंदहवी सदी में कश्मीर में इस्लाम के प्रवेश के बाद से लेकर आज तक कश्मीर हमेशा ही अपनी शांति के लिए जलता रहा है। सन १८४६ में कश्मीर में सिखों और अंग्रेजो के बीच संघर्ष हुआ. मुद्दा कश्मीर पर अंग्रेजों के अधिकार से जुड़ा था. बाद में अंग्रेजों ने ७५ लाख रुपये में राजा गुलाब सिंह को कश्मीर दे दिया. समय बीतता गया और सन १९२५ में गुलाब सिंह की ही पीढ़ी हरी सिंह को राजा बनाया गया. इसी समय एक बार फिर से गहती में मुस्लिम सियासत शुरू हुयी. १९४७ में राजा हरी सिंह और भारत सरकार के बीच कश्मीर के विलय को लेकर बातचीत चल ही रही थी कि पाकिस्तान के पख्तून काबिले के लोगों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया. हरी सिंह कश्मीर की रक्षा कर पाने में असहाय थे. भारत की सेना ने कश्मीर का वजूद बचाया. इसके साथ ही कश्मीर और भारत एक हो गए. १९७५ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और शेख अब्दुला के बीच हुए समझौते के बाद कश्मीर और भारत पूरी तरह से एक हो गए...
लेकिन फिर भी अरुंधती का ये बयान उनकी ओछी मानसिकता और लोकप्रियता हासिल करने की घटिया राजनीति को दर्शाती है । गिलानी और अरुंधती में फर्क सिर्फ इतना है की गिलानी पडोसी देश की खाता है और वहीं गाता है लेकिन अरुंधती अपने देश में रह के भी अपने देश की सच्चाई से वाकिफ नहीं है तो हम कह सकते है के गिलानी अरुंधती से बेहतर नमकभक्त है..
धन्यवाद ....
Monday, November 1, 2010
Wednesday, September 29, 2010
मै अयोध्या हूँ...
मै अयोध्या हूँ...
मैंने दिन देखा है, मैंने दुनिया देखी है, मैंने समय देखा है, मैंने लोग देखे है श्री राम से लेकर मनमोहन सिंह तक। वक़्त बदला लोग बदले पर मै आज भी वही हूँ और शांत खड़ा होकर तमाशा देखा रहा हूँ । मेरे नाम पर पंडित देखे, मेरे नाम पर मुल्ला और मौलबी देखे, मेरे नाम पर नेता देखे और मेरे नाम की राजनीति देखी । लोगों ने मुद्दे भी खुद बनाए संघर्ष भी आपस में ही किया और आज तक हल नहीं निकल पाए।
चलिए मै आपको अपनी कहानी सुनाता हूँ...
मै रामजन्मभूमि अयोध्या उत्तर प्रदेश में सरयू नदी के दाएं तट पर बसा हूँ । प्राचीन काल में मुझे कौशल देश कहा जाता था। मै हिन्दुओं के प्राचीन और सात पवित्र तीर्थस्थलों में से एक हूँ । अथर्ववेद में मुझे ईश्वर का नगर बताया गया है और मेरी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार मेरी स्थापना मनु ने की थी। कई शताब्दियों तक मै सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। यहां आज भी हिन्दू, बौद्ध, इस्लाम और जैन धर्म से जुड़े अवशेष देखे जा सकते हैं। जैन मत के अनुसार यहां आदिनाथ सहित पांच र्तीथकरों का जन्म हुआ था।
विवाद...
1528: हिन्दूओं के आराध्य देवता श्रीराम की जन्मभूमि पर मस्जिद बनवाई गई। बताया जाता है कि इसे मुग़ल सम्राट बाबर ने बनवाया था।
1853: यह वह वर्ष था जब अयोध्या में मंदिर-मस्जिद विवाद का मुद्दा बना। और पहली बार इस स्थल के पास सांप्रदायिक दंगे हुए।
1859: इस विवाद को सुलझाने के लिए तत्कालीन शासक ने विवादित जगह को चारों तरफ से घेर दिया। अब मुसलमान विवादित परिसर के भीतर इबादत और हिन्दू बाहर प्रार्थना करने लगे।
1949: दोनों पक्षों ने अदालत में मुकदमा दायर किया। सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित कर दिया और ताला लगा दिया।
1984: विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में एक समिति का गठन। जिसका मुख्य उद्देश्य राम जन्मभूमि को मुक्त करना था। बाद में इस अभियान की जिम्मेदारी भाजपा के एक प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी पास आ गईं।
1986: बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन। फैजाबाद सेशन कोर्ट ने विवादित मस्जिद के दरवाज़े पर से ताला खोलने का आदेश दिया। मुसलमानों ने विरोध किया।
1989: विश्व हिंदू परिषद ने विवादित स्थल के नज़दीक राम मंदिर की नींव रखी।
1992: 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। इसमें विहिप, भाजपा व शिव सेना के कार्यकर्ता शामिल थे। सांप्रदायिक दंगे हुए। 2000 से अधिक लोग मारे गए।
13 मार्च, 2002: सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या पर अपना निर्णय देते हुए कहाकि यथास्थिति बरक़रार रखी जाएगी। शिलापूजन नहीं होगी।
अप्रैल 2003: इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्देश पर पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने विवादित स्थल की खुदाई शुरू की, जून महीने तक खुदाई चलने के बाद आई रिपोर्ट में कहा गया है कि उसमें मंदिर से मिलते जुलते अवशेष मिले हैं।
19 मार्च 2007: राहुल गाँधी ने चुनावी दौरे में कहा कि अगर नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद न गिरी होती।
30 जून 2009: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 17 वर्षों के बाद लिब्रहान आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट सौंपी। इस आयोग का गठन बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की जांच के लिए गठित किया गया था। लेकिन कुछ भी साफ़ नहीं हो पाया।
जुलाई, 2010: रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद पर सुनवाई पूरी।
सितम्बर 2010 : ३० सितम्बर को इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच सुनाएगी फैसला ।
"'मेरे शरीर पर हजारो ज़ख़्म दिए फिर भी मै मुस्कुराता रहा लोगों की मूर्खता पर की "दिल में बसने वाले परमात्मा को लोग कहाँ तलाश रहे है" कभी मंदिर बनवाया तो कभी मस्जिद'"।
धन्यवाद ...
मैंने दिन देखा है, मैंने दुनिया देखी है, मैंने समय देखा है, मैंने लोग देखे है श्री राम से लेकर मनमोहन सिंह तक। वक़्त बदला लोग बदले पर मै आज भी वही हूँ और शांत खड़ा होकर तमाशा देखा रहा हूँ । मेरे नाम पर पंडित देखे, मेरे नाम पर मुल्ला और मौलबी देखे, मेरे नाम पर नेता देखे और मेरे नाम की राजनीति देखी । लोगों ने मुद्दे भी खुद बनाए संघर्ष भी आपस में ही किया और आज तक हल नहीं निकल पाए।
चलिए मै आपको अपनी कहानी सुनाता हूँ...

मै रामजन्मभूमि अयोध्या उत्तर प्रदेश में सरयू नदी के दाएं तट पर बसा हूँ । प्राचीन काल में मुझे कौशल देश कहा जाता था। मै हिन्दुओं के प्राचीन और सात पवित्र तीर्थस्थलों में से एक हूँ । अथर्ववेद में मुझे ईश्वर का नगर बताया गया है और मेरी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार मेरी स्थापना मनु ने की थी। कई शताब्दियों तक मै सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। यहां आज भी हिन्दू, बौद्ध, इस्लाम और जैन धर्म से जुड़े अवशेष देखे जा सकते हैं। जैन मत के अनुसार यहां आदिनाथ सहित पांच र्तीथकरों का जन्म हुआ था।
विवाद...

1528: हिन्दूओं के आराध्य देवता श्रीराम की जन्मभूमि पर मस्जिद बनवाई गई। बताया जाता है कि इसे मुग़ल सम्राट बाबर ने बनवाया था।
1853: यह वह वर्ष था जब अयोध्या में मंदिर-मस्जिद विवाद का मुद्दा बना। और पहली बार इस स्थल के पास सांप्रदायिक दंगे हुए।
1859: इस विवाद को सुलझाने के लिए तत्कालीन शासक ने विवादित जगह को चारों तरफ से घेर दिया। अब मुसलमान विवादित परिसर के भीतर इबादत और हिन्दू बाहर प्रार्थना करने लगे।
1949: दोनों पक्षों ने अदालत में मुकदमा दायर किया। सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित कर दिया और ताला लगा दिया।
1984: विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में एक समिति का गठन। जिसका मुख्य उद्देश्य राम जन्मभूमि को मुक्त करना था। बाद में इस अभियान की जिम्मेदारी भाजपा के एक प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी पास आ गईं।
1986: बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन। फैजाबाद सेशन कोर्ट ने विवादित मस्जिद के दरवाज़े पर से ताला खोलने का आदेश दिया। मुसलमानों ने विरोध किया।
1989: विश्व हिंदू परिषद ने विवादित स्थल के नज़दीक राम मंदिर की नींव रखी।
1992: 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। इसमें विहिप, भाजपा व शिव सेना के कार्यकर्ता शामिल थे। सांप्रदायिक दंगे हुए। 2000 से अधिक लोग मारे गए।
13 मार्च, 2002: सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या पर अपना निर्णय देते हुए कहाकि यथास्थिति बरक़रार रखी जाएगी। शिलापूजन नहीं होगी।
अप्रैल 2003: इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्देश पर पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने विवादित स्थल की खुदाई शुरू की, जून महीने तक खुदाई चलने के बाद आई रिपोर्ट में कहा गया है कि उसमें मंदिर से मिलते जुलते अवशेष मिले हैं।
19 मार्च 2007: राहुल गाँधी ने चुनावी दौरे में कहा कि अगर नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद न गिरी होती।
30 जून 2009: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 17 वर्षों के बाद लिब्रहान आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट सौंपी। इस आयोग का गठन बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की जांच के लिए गठित किया गया था। लेकिन कुछ भी साफ़ नहीं हो पाया।
जुलाई, 2010: रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद पर सुनवाई पूरी।
सितम्बर 2010 : ३० सितम्बर को इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच सुनाएगी फैसला ।
"'मेरे शरीर पर हजारो ज़ख़्म दिए फिर भी मै मुस्कुराता रहा लोगों की मूर्खता पर की "दिल में बसने वाले परमात्मा को लोग कहाँ तलाश रहे है" कभी मंदिर बनवाया तो कभी मस्जिद'"।
धन्यवाद ...
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Friday, September 24, 2010
इंसान जो तजुर्बे से नहीं सीखता...
पंडित जवाहर लाल नेहरु- १९३५
आजकल अखबारों में लाहोर की शहीदगंज मस्जिद की प्रतिदिन कुछ न कुछ चर्चा होती है । शहर में काफी खलबली मची हुई है । दोनों तरफ मज़हबी जोश दिखता है । एक दूसरे पर हमले होते है, एक दूसरे की बद्नीयतें की शिकायत होती है और बीच में एक पंच की तरह अँगरेज़ अपनी हुकूमत की ताक़त दिखाती है। मुझे न तो वाक़यात ही ठीक ठीक मालूम है की किसने ये सिलसिला पहले छेड़ा था या किसकी गलती थी औं न ही इसकी जांच करने का मेरा कोई इरादा है । इस तरह के धार्मिक जोश में मुझे दिलचस्पी भी नहीं है । लेकिन दिलचस्पी हो या न हो जब वह दुर्भाग्य से पैदा हो जाये, तो उसका सामना करना पड़ता है । मई सोचता था की हम लोग इस देश में कितने पिछड़े हुए है की अदना सी बात पर जान देने को उतारू हो जाते है, पर अपनी गुलामी और फाके मस्ती सहने को तैयार रहते है ।
इस मस्जिद से मेरा ध्यान दूसरी तरफ जा पंहुचा । वह बहुत प्रसिद्द और ऐतिहासिक मस्जिद है और करीब चौदह सौ वर्ष से करोडो निगाहें उसकी तरफ देखती आई है । वो इस्लाम से भी लम्बी है और उसने अपनी लम्बी जिंदगी में न-जाने क्या-२ देखा है। बुज़ुर्गी और शान उसके एक एक पत्थर से टपकती है । क्या सोचते होंगे उसके पत्थर, जब ऊँचाई से मनुष्यों की भीड़ को देखते होंगे। बच्चों के खेल, बड़ों की लड़ाई, फरेब और बेवकूफी ? हजारों वर्षों में इन्होने कितना कम सीखा ! और कितने दिन लगेंगे की इन्हें अक्ल आये और समझ आये।
ईसा की चौथी सदी ख़त्म होने वाली थी जब कोंस्टेंतिनोपुल (कुस्तुनतुनिया) का जन्म हुआ । कुस्तुन्तुनिया में सम्राटों की आगया से बड़ी-२ इमारतें बनी और बहुत जल्द वो एक विशाल नगर हो गया। उस समय यूरोप में कोई दूसरा शहर उसका मुकाबला नहीं कर सकता था- रोम भी तेज़ी से पिछ्ड गया था । वहां की इमारते नयी तर्ज़ पर बनी , भवन बनाने में नयी कला का आगमन हुआ, जिसमे मेहराब, गुम्बज, बुर्जिया, खम्भे, इत्यादि शामिल थे। ये इमारती कला बंजेटाईंन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। और छठी सदी में कुस्तुनतुनिया में एक आलिशान कैथीड्रल चर्च इस कला से बनाया गया जो सेंत सेफिया के ना से मशहूर हुआ। सेंत सेफिया का कैथिद्रिल ग्रीक चर्च धर्म का केंद्र था और नौ सौ वर्षों तक ऐसा ही रहा।
पंद्रहवी शताब्दी में उस्मान्वी तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया पर फतह पाई । नतीजा ये हुआ की वहां का सबसे बड़ा कैथीड्रल चर्च जो इसाई धर्म का केंद्र था वो अब सबसे बड़ी मस्जिद बन चूका था। सेंत सुफिया का नाम आया सुफिया हो गया था। उसकी ये नयी जिंदगी भी सैकड़ो वर्षो की निकली।
उन्नीसवी सदी में तुर्की साम्राज्य एक बार फिर कमज़ोर पड़ने लगा और रूस कुस्तुन्तुनिया के तरफ लालच भरी आँखों से देखता था । रूस के जार अपने को पूर्वी रोमन सम्राटों के वारिस समझते थे और उनकी पुरानी राजधानी कब्ज़े में लेना चाहते थे। रूस को ये असह्य था की उसके धर्म का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित गिरजा घर, मस्जिद बनी रहे।
धीरे धीरे जारो का रूस, कुस्तुन्तुनिया की और बढ़ता गया, लेकिन उनके ये मंसीबे पूरे नहीं हुए । उससे पहले जारो का रूस ही ख़त्म हो गया। वह क्रांति हुई, हुकूमत और समाज दोनों में उलटफेर हो गया। बोल्शेविको ने घोषणा की, की वो साम्राज्यवाद के विरुद्ध है औए किसी दुसरे देश पर अधीकार नहीं चाहते है । हरेक जाती को स्वतंत्र रहने का अधिकार है।
लेकिन अंग्रेजो ने कुस्तुन्तुनिया पर कब्ज़ा किया और ४८६ वर्षो के बाद एक बार फिर हुकूमत इसाई हाथो में थी। सुलतान खलीफा ज़रूर थे लेकिन कठपुतली की भाँती, आया सुफिया भी हस्बमामूल कड़ी थी पर अब उसकी वो शान कहाँ जो आज़ाद वक़्त में थी। सुलतान से सर झुकाया, लेकिन चाँद तुर्क ऐसे थे जिन्हें गुलामी कबूल नहीं थी जिनमे से एक थे मुस्तफा कमाल और उन्होंने बगावत की बिगुल फूँक डाली।
मुस्तफा कमाल पाशा ने ग्रीक फौज़ों को हरा कर बाहर खदेड़ दिया और सुलतान को भी गद्दार कहकर निकाल दिया। पुरानी राजधानी कुस्तुन्तुनिया का नाम बदल दिया गया और अब वो इस्ताम्बुल हो गया और आया सुफिया उसका क्या हुआ चौदह सौ वर्ष की इमारत इस्ताम्बुल में खड़ी है और जिंदगी की ऊंच नीच देखती जाती है । नौ सौ वर्षो तक उसने ग्रीक के धार्मिक गाने और अनेक सुगंधियों को सूंघा । फिर ४८० वर्षो तक अरबी आवाज़ की अजान उसकी कानो में पड़ी। और अब ?
एक दिन कुछ महीनो की बात है इसी साल १९३५ में ग़ाज़ी मुस्तफा कमाल पाशा के हुक्म से आया सुफिया मस्जिद नहीं रही । बगैर किसी धूम-धाम के वहाँ के मुल्ला मौलबी अन्य मस्जिदों में भेज दिए गए और तय किया गया की सुफिया मस्जिद नहीं संग्रहालय होगी खासकर बैजेंताइन कला का। ये कला इसाई के ज़माने का था तो सुफिया एक बार फिर से इसाई ज़माने को वापस चली गयी।
लेकिन वो पत्थर वो दीवारे खामोश है । उन्होंने इतावर की इसाई पूजा बहुत देखी और बहुत देखी जुमे की नमाज़। अब हर दिन की नुमाइश है उनके साए में । दुनिया बदलती रही लेकिन वे कायम है । उनके घिसे हुए चेहरे पर कुछ हलकी सी मुस्कराहट मालूम होती है और कानो में धीमी सी आवाज़ आती है -"इंसान भी कितना बेवकूफ और जाहिल है की हजारो वर्षों के तजुर्बे से नहीं सीखता और बार-बार वही हिमाकतें करता है"
फरवरी १९३५ में लिखा गया नेहरु जी का ये लेख लाहौर शहीद्गंज गुरुद्वारा बनाम मस्जिद के विवाद पर केन्द्रित था। जो आज भी जीवंत लगता है।
धन्यवाद...
आजकल अखबारों में लाहोर की शहीदगंज मस्जिद की प्रतिदिन कुछ न कुछ चर्चा होती है । शहर में काफी खलबली मची हुई है । दोनों तरफ मज़हबी जोश दिखता है । एक दूसरे पर हमले होते है, एक दूसरे की बद्नीयतें की शिकायत होती है और बीच में एक पंच की तरह अँगरेज़ अपनी हुकूमत की ताक़त दिखाती है। मुझे न तो वाक़यात ही ठीक ठीक मालूम है की किसने ये सिलसिला पहले छेड़ा था या किसकी गलती थी औं न ही इसकी जांच करने का मेरा कोई इरादा है । इस तरह के धार्मिक जोश में मुझे दिलचस्पी भी नहीं है । लेकिन दिलचस्पी हो या न हो जब वह दुर्भाग्य से पैदा हो जाये, तो उसका सामना करना पड़ता है । मई सोचता था की हम लोग इस देश में कितने पिछड़े हुए है की अदना सी बात पर जान देने को उतारू हो जाते है, पर अपनी गुलामी और फाके मस्ती सहने को तैयार रहते है ।
इस मस्जिद से मेरा ध्यान दूसरी तरफ जा पंहुचा । वह बहुत प्रसिद्द और ऐतिहासिक मस्जिद है और करीब चौदह सौ वर्ष से करोडो निगाहें उसकी तरफ देखती आई है । वो इस्लाम से भी लम्बी है और उसने अपनी लम्बी जिंदगी में न-जाने क्या-२ देखा है। बुज़ुर्गी और शान उसके एक एक पत्थर से टपकती है । क्या सोचते होंगे उसके पत्थर, जब ऊँचाई से मनुष्यों की भीड़ को देखते होंगे। बच्चों के खेल, बड़ों की लड़ाई, फरेब और बेवकूफी ? हजारों वर्षों में इन्होने कितना कम सीखा ! और कितने दिन लगेंगे की इन्हें अक्ल आये और समझ आये।
ईसा की चौथी सदी ख़त्म होने वाली थी जब कोंस्टेंतिनोपुल (कुस्तुनतुनिया) का जन्म हुआ । कुस्तुन्तुनिया में सम्राटों की आगया से बड़ी-२ इमारतें बनी और बहुत जल्द वो एक विशाल नगर हो गया। उस समय यूरोप में कोई दूसरा शहर उसका मुकाबला नहीं कर सकता था- रोम भी तेज़ी से पिछ्ड गया था । वहां की इमारते नयी तर्ज़ पर बनी , भवन बनाने में नयी कला का आगमन हुआ, जिसमे मेहराब, गुम्बज, बुर्जिया, खम्भे, इत्यादि शामिल थे। ये इमारती कला बंजेटाईंन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। और छठी सदी में कुस्तुनतुनिया में एक आलिशान कैथीड्रल चर्च इस कला से बनाया गया जो सेंत सेफिया के ना से मशहूर हुआ। सेंत सेफिया का कैथिद्रिल ग्रीक चर्च धर्म का केंद्र था और नौ सौ वर्षों तक ऐसा ही रहा।

पंद्रहवी शताब्दी में उस्मान्वी तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया पर फतह पाई । नतीजा ये हुआ की वहां का सबसे बड़ा कैथीड्रल चर्च जो इसाई धर्म का केंद्र था वो अब सबसे बड़ी मस्जिद बन चूका था। सेंत सुफिया का नाम आया सुफिया हो गया था। उसकी ये नयी जिंदगी भी सैकड़ो वर्षो की निकली।
उन्नीसवी सदी में तुर्की साम्राज्य एक बार फिर कमज़ोर पड़ने लगा और रूस कुस्तुन्तुनिया के तरफ लालच भरी आँखों से देखता था । रूस के जार अपने को पूर्वी रोमन सम्राटों के वारिस समझते थे और उनकी पुरानी राजधानी कब्ज़े में लेना चाहते थे। रूस को ये असह्य था की उसके धर्म का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित गिरजा घर, मस्जिद बनी रहे।
धीरे धीरे जारो का रूस, कुस्तुन्तुनिया की और बढ़ता गया, लेकिन उनके ये मंसीबे पूरे नहीं हुए । उससे पहले जारो का रूस ही ख़त्म हो गया। वह क्रांति हुई, हुकूमत और समाज दोनों में उलटफेर हो गया। बोल्शेविको ने घोषणा की, की वो साम्राज्यवाद के विरुद्ध है औए किसी दुसरे देश पर अधीकार नहीं चाहते है । हरेक जाती को स्वतंत्र रहने का अधिकार है।
लेकिन अंग्रेजो ने कुस्तुन्तुनिया पर कब्ज़ा किया और ४८६ वर्षो के बाद एक बार फिर हुकूमत इसाई हाथो में थी। सुलतान खलीफा ज़रूर थे लेकिन कठपुतली की भाँती, आया सुफिया भी हस्बमामूल कड़ी थी पर अब उसकी वो शान कहाँ जो आज़ाद वक़्त में थी। सुलतान से सर झुकाया, लेकिन चाँद तुर्क ऐसे थे जिन्हें गुलामी कबूल नहीं थी जिनमे से एक थे मुस्तफा कमाल और उन्होंने बगावत की बिगुल फूँक डाली।
मुस्तफा कमाल पाशा ने ग्रीक फौज़ों को हरा कर बाहर खदेड़ दिया और सुलतान को भी गद्दार कहकर निकाल दिया। पुरानी राजधानी कुस्तुन्तुनिया का नाम बदल दिया गया और अब वो इस्ताम्बुल हो गया और आया सुफिया उसका क्या हुआ चौदह सौ वर्ष की इमारत इस्ताम्बुल में खड़ी है और जिंदगी की ऊंच नीच देखती जाती है । नौ सौ वर्षो तक उसने ग्रीक के धार्मिक गाने और अनेक सुगंधियों को सूंघा । फिर ४८० वर्षो तक अरबी आवाज़ की अजान उसकी कानो में पड़ी। और अब ?एक दिन कुछ महीनो की बात है इसी साल १९३५ में ग़ाज़ी मुस्तफा कमाल पाशा के हुक्म से आया सुफिया मस्जिद नहीं रही । बगैर किसी धूम-धाम के वहाँ के मुल्ला मौलबी अन्य मस्जिदों में भेज दिए गए और तय किया गया की सुफिया मस्जिद नहीं संग्रहालय होगी खासकर बैजेंताइन कला का। ये कला इसाई के ज़माने का था तो सुफिया एक बार फिर से इसाई ज़माने को वापस चली गयी।
लेकिन वो पत्थर वो दीवारे खामोश है । उन्होंने इतावर की इसाई पूजा बहुत देखी और बहुत देखी जुमे की नमाज़। अब हर दिन की नुमाइश है उनके साए में । दुनिया बदलती रही लेकिन वे कायम है । उनके घिसे हुए चेहरे पर कुछ हलकी सी मुस्कराहट मालूम होती है और कानो में धीमी सी आवाज़ आती है -"इंसान भी कितना बेवकूफ और जाहिल है की हजारो वर्षों के तजुर्बे से नहीं सीखता और बार-बार वही हिमाकतें करता है"
फरवरी १९३५ में लिखा गया नेहरु जी का ये लेख लाहौर शहीद्गंज गुरुद्वारा बनाम मस्जिद के विवाद पर केन्द्रित था। जो आज भी जीवंत लगता है।
धन्यवाद...
Tuesday, September 21, 2010
क्या होगा... सोच के भी रूह काँप जाती है
क्या होगा... सोच के भी रूह काँप जाती है
नवम्बर २००३ । ये वो माह था जब भारत में राष्ट्रमंडल के खेलों के आयोजन का रास्ता साफ़ हो गया । लेकिन हमारी नेताओ की जेब भरे तब तो वो भारत या राष्ट्र के बारे में सोचे । यहाँ के नेता राष्ट्र हित से पहले स्वार्थ हित को रखते है जो की समस्या का मूल जड़ है । डर लगता है कहीं राष्ट्र मंडल खेल राष्ट्रीय शर्म न बन जाए और हमारी छवि विश्व पटल पर ख़राब न हो जाये । हमने अपनी छवि बनाने के लिए बहुत मेहनत की है और इसपर एक भी दाग बर्दास्त नहीं किया जाएगा । ताज़ा घटना जवाहर लाल नेहरु स्टेडियम का है जहां निर्माणाधीन फुट ओवरब्रिज ढह गया। इस हादसे में 23 मजदूर घायल हो गए हैं जिनमें पांच की हालत बेहद गंभीर है। इस स्टेडियम में ही कॉमनवेल्थ गेम्स की ओपनिंग है। बाद में भी कई अहम आयोजन यहां होने हैं। इस फुट ब्रिज को विशेष तौर से कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए ही तैयार किया जा रहा है। इस ब्रिज का इस्तेमाल खेलों के दौरान एथलीटों द्वारा किया जाना है। वहीँ दूसरी तरफ खेल गाँव में बने फ्लेट्स की हालत भी चिंताजनक है, न्यूजीलैंड, स्कॉटलैंड, कनाडा और इजरायल ने अपने-अपने दलों के लिए आवंटित आवासों में घटिया रखरखाव और खराब बंदोबस्त की शिकायत की है। खिलाडियों के दल गुरूवार से खेल गांव में पहुंचना शुरू हो जाएगा। भारत में 1982 में हुए एशियाई खेलों के बाद यह देश का सबसे ब़डा आयोजन है। इस आयोजन में 71 देशों के लगभग 7,000 खिलाडियों और अधिकारियों के हिस्सा लेने की संभावना है।
मैं एक बार फिर दोहराना चाहूँगा की हमने अपनी छवि को को बनाने में बहुत कुछ खोया है और जो कोई भी इसे ख़राब करने की कोशिश करेगा या किया है उसे बुरे अंजाम भुगतने होंगे...
धन्यवाद...
नवम्बर २००३ । ये वो माह था जब भारत में राष्ट्रमंडल के खेलों के आयोजन का रास्ता साफ़ हो गया । लेकिन हमारी नेताओ की जेब भरे तब तो वो भारत या राष्ट्र के बारे में सोचे । यहाँ के नेता राष्ट्र हित से पहले स्वार्थ हित को रखते है जो की समस्या का मूल जड़ है । डर लगता है कहीं राष्ट्र मंडल खेल राष्ट्रीय शर्म न बन जाए और हमारी छवि विश्व पटल पर ख़राब न हो जाये । हमने अपनी छवि बनाने के लिए बहुत मेहनत की है और इसपर एक भी दाग बर्दास्त नहीं किया जाएगा । ताज़ा घटना जवाहर लाल नेहरु स्टेडियम का है जहां निर्माणाधीन फुट ओवरब्रिज ढह गया। इस हादसे में 23 मजदूर घायल हो गए हैं जिनमें पांच की हालत बेहद गंभीर है। इस स्टेडियम में ही कॉमनवेल्थ गेम्स की ओपनिंग है। बाद में भी कई अहम आयोजन यहां होने हैं। इस फुट ब्रिज को विशेष तौर से कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए ही तैयार किया जा रहा है। इस ब्रिज का इस्तेमाल खेलों के दौरान एथलीटों द्वारा किया जाना है। वहीँ दूसरी तरफ खेल गाँव में बने फ्लेट्स की हालत भी चिंताजनक है, न्यूजीलैंड, स्कॉटलैंड, कनाडा और इजरायल ने अपने-अपने दलों के लिए आवंटित आवासों में घटिया रखरखाव और खराब बंदोबस्त की शिकायत की है। खिलाडियों के दल गुरूवार से खेल गांव में पहुंचना शुरू हो जाएगा। भारत में 1982 में हुए एशियाई खेलों के बाद यह देश का सबसे ब़डा आयोजन है। इस आयोजन में 71 देशों के लगभग 7,000 खिलाडियों और अधिकारियों के हिस्सा लेने की संभावना है।
मैं एक बार फिर दोहराना चाहूँगा की हमने अपनी छवि को को बनाने में बहुत कुछ खोया है और जो कोई भी इसे ख़राब करने की कोशिश करेगा या किया है उसे बुरे अंजाम भुगतने होंगे...
धन्यवाद...
Friday, September 17, 2010
Thursday, September 16, 2010
हिंदी ...
हिंदी ...
"हिंदी हैं हम वतन है हिन्दुस्तां हमारा" ये चंद शब्द ऐसे है जो आय दिन हमारे कान में पड़ते रहते है, अभी हिंदी पखवाडा मनाया जा रहा है वैसे तो हम स्वतंत्रता दिवस भी मानते है और न जाने कितने तरह के दिवस लेकिन सिर्फ दिवस के दिन ही विषय याद रखा जाता है। चलिए लौटते हैं विषय पर हिंदी...
कहते है भाषा माँ होती है और फिर हिंदी हो, मराठी हो या अंग्रेजी, भाषा कसी राष्ट्र या प्रदेश के विकास में बाधक नहीं हो सकती है। और जो लोग इसे अपना हथियार बनाते है उनका मकसद साफ़ होता है..... स्वार्थ...
विडम्बना की बात ये की देश के शीर्ष में बैठे कुछ लोग जो देश के प्रतिनिधि है वो भी हिंदी से डरते है और देश में एक तबका ऐसा भी जो हिंदी में बात करना अपमानजनक समझता है।
भाषा की व्यापकता दर्शाता है की हमारा राष्ट्र कितना समृद्ध है । सिर्फ भारत ही एक ऐसा देश है जहा पर हर प्रान्त में अलग अलग भाषाए बोली जाती है, फिर भी हिंदी हमारी मुख्य भाषा है । भारत हिंदी में सोचता है, हिंदी में बोलता है, हिंदी में सुनता है और हिंदी में ही गुनता है । गाँधी जी समझते थे की हिंदी में योजक क्षमता ज्यादा है इसलिए उन्होंने १९०९ में ही लिखा था "हिन्दुस्तान की राष्ट्र भाषा हिंदी ही होनी चाहिए "
अगर बात की जाये अंग्रेजी की तो भारत में अंग्रेजी का मुकाबला हिंदी से हो ही नहीं सकता क्योंकि अगर ऐसा होता तो भारत की फिल्म इंडस्ट्री ६०-६५ हज़ार कड़ोर के पार नहीं होती। वर्ष १९४९ की बात की जाये तो भारत के नए महाराजाओ ने अंग्रेजी को महारानी और हिंदी को नौकरानी घोषित कर दिया था लेकिन हिंदी फिर भी पंख फैला कर उडी। क्योंकि भारत में हिंदी व्यापर की भाषा है, सुचना और संचार की भाषा है, राजनितिक प्रचार की भाषा है। हिंदी ने इंग्लिश, मराठी, तमिल, तेलगु, भोजपुरी इन सभी भाषाओ को अपनाया है । उर्दू पहले से ही हिंदी के आँचल में है और विदेशी अंग्रेजी भी पुरे ठिठाई के साथ हिंदी के अंत क्षेत्र में हेन्ग्लिश (हिंदी+इंग्लिश) बनकर समां गयी । हिंदी सर्व समावेशी है, हिंदी ज्ञान की भाषा है हिंदी विज्ञानं की भाषा है संस्कृत और दर्शन की भाषा है ।
भारत हिंदी में खेलता है हिंदी में पलता है हिंदी में हँसता है और गुंडाराज के थप्पड़ खाकर हिंदी में ही रोता है सबसे बड़ी बात ये है की हिंदी भारत के मन की भाषा है।
"हिंदी हैं हम वतन है हिन्दुस्तां हमारा" ये चंद शब्द ऐसे है जो आय दिन हमारे कान में पड़ते रहते है, अभी हिंदी पखवाडा मनाया जा रहा है वैसे तो हम स्वतंत्रता दिवस भी मानते है और न जाने कितने तरह के दिवस लेकिन सिर्फ दिवस के दिन ही विषय याद रखा जाता है। चलिए लौटते हैं विषय पर हिंदी...
कहते है भाषा माँ होती है और फिर हिंदी हो, मराठी हो या अंग्रेजी, भाषा कसी राष्ट्र या प्रदेश के विकास में बाधक नहीं हो सकती है। और जो लोग इसे अपना हथियार बनाते है उनका मकसद साफ़ होता है..... स्वार्थ...
विडम्बना की बात ये की देश के शीर्ष में बैठे कुछ लोग जो देश के प्रतिनिधि है वो भी हिंदी से डरते है और देश में एक तबका ऐसा भी जो हिंदी में बात करना अपमानजनक समझता है।
भाषा की व्यापकता दर्शाता है की हमारा राष्ट्र कितना समृद्ध है । सिर्फ भारत ही एक ऐसा देश है जहा पर हर प्रान्त में अलग अलग भाषाए बोली जाती है, फिर भी हिंदी हमारी मुख्य भाषा है । भारत हिंदी में सोचता है, हिंदी में बोलता है, हिंदी में सुनता है और हिंदी में ही गुनता है । गाँधी जी समझते थे की हिंदी में योजक क्षमता ज्यादा है इसलिए उन्होंने १९०९ में ही लिखा था "हिन्दुस्तान की राष्ट्र भाषा हिंदी ही होनी चाहिए "
अगर बात की जाये अंग्रेजी की तो भारत में अंग्रेजी का मुकाबला हिंदी से हो ही नहीं सकता क्योंकि अगर ऐसा होता तो भारत की फिल्म इंडस्ट्री ६०-६५ हज़ार कड़ोर के पार नहीं होती। वर्ष १९४९ की बात की जाये तो भारत के नए महाराजाओ ने अंग्रेजी को महारानी और हिंदी को नौकरानी घोषित कर दिया था लेकिन हिंदी फिर भी पंख फैला कर उडी। क्योंकि भारत में हिंदी व्यापर की भाषा है, सुचना और संचार की भाषा है, राजनितिक प्रचार की भाषा है। हिंदी ने इंग्लिश, मराठी, तमिल, तेलगु, भोजपुरी इन सभी भाषाओ को अपनाया है । उर्दू पहले से ही हिंदी के आँचल में है और विदेशी अंग्रेजी भी पुरे ठिठाई के साथ हिंदी के अंत क्षेत्र में हेन्ग्लिश (हिंदी+इंग्लिश) बनकर समां गयी । हिंदी सर्व समावेशी है, हिंदी ज्ञान की भाषा है हिंदी विज्ञानं की भाषा है संस्कृत और दर्शन की भाषा है ।
भारत हिंदी में खेलता है हिंदी में पलता है हिंदी में हँसता है और गुंडाराज के थप्पड़ खाकर हिंदी में ही रोता है सबसे बड़ी बात ये है की हिंदी भारत के मन की भाषा है।
Wednesday, September 15, 2010
गुणवत्ता नहीं रिश्तेदार चाहिए...
गुणवत्ता नहीं रिश्तेदार चाहिए...
मीडिया एक ऐसा क्षेत्र जो की रंगों की चकाचौंध से भरपूर है और अपने तरफ आज के युवाओं को अपने ओर बहुत तेज़ी से आकर्षित कर रहा है पर मै उनको सावधान ज़रूर करना चाहूँगा... ! ये दुनिया आपके गुणों को नहीं देखती है और अन्दर एक घटिया राजनीति है ।
मेरा नाम विवेक शांडिल्य है और मैंने कुछ समय पहले ही पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा है । पहले मै काफी उत्साहित था की मुझे मौका मिलेगा देश के लिए कुछ करने का । बहुत मशक्कत करने क बाद मैंने इस क्षेत्र में एक संस्थान में दाखिला कराया । कोर्स फी सुन के तो एक पल के लिए मैंने अपना कदम पीछे हटा लिया लेकिन मेरे भैया ने मुझे सपोर्ट किया और प्रोत्साहित भी किया । तब मै इस क्षेत्र के बारे में मै बहुत कम जानता था और मै उत्साहित भी था । लेकिन समय बीतता गया और परत दर परत मीडिया की असलियत सामने आती गयी । और धीरे धीरे मुझे पता चलने लगा के जो क्षेत्र मैंने चुना है उसमे सड़ांध अपने चरम पर है ।
मीडिया जिसे हम लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ का चौथा स्तम्भ, समाज का प्रहरी और न जाने क्या क्या कहते है लेकिन इस स्तम्भ के सरिये में जंग लग चुका है । ऐसी व्यवस्था जिसमे खुद एक बड़ा होल है वो समाज की व्यवस्था का होल कैसे भरेगी । आप मेरा इशारा समझ रहे होंगे । आज मै एक चैनल में समाचार वाचक (न्यूज़ एंकर) के रूप में काम करता हूँ और आगे बढ़ने की कोशिश भी करता हूँ पर मेरे कोशिश को उस समय एक बड़ा धक्का लगता है जब मुझसे मेरे गुण के बजाय मुझसे बाद में आने को कहा जाता है यहाँ तक की सी.वी को गार्ड के पास जमा करने को कहा जाता है और बाद में उस सी.वी का सदुपयोग उसे टुकड़ों में बाँट, पर्ची के तौर पर किया जाता है। लेकिन इन सब के बीच एक शब्द है जैक जिसके बारे में मै अपने दोस्तों से हमेशा सुनता हूँ । मुझसे कहा जाता है की अगर कम्पनी में कोई जान- पहचान का हो तो उससे बात करो तुम्हे नौकरी मिल जाएगी । क्या मीडिया ने ऐसे समाज का निमार्ण किया है जिसमे गुणों का कोई महत्व नहीं होगा जहां रिश्तों को महत्व दी जायेगी, परिवारवाद चलेगा . अगर आप किसी न्यूज़ एंकर, रिपोर्टर, या किसी मीडियाकर्मी के घर पैदा हुए हैं तो आपको चिंता करने की ज़रुरत नहीं है । और अगर आपकी नौकरी बिना किसी रिश्ते के हो जाती है तो वाकई भगवान् आप पर मेहरबान है। जो व्यस्था खुद बीमार है वो समाज को स्वास्थ्य कैसे बना सकता है । धन्यवाद
मीडिया एक ऐसा क्षेत्र जो की रंगों की चकाचौंध से भरपूर है और अपने तरफ आज के युवाओं को अपने ओर बहुत तेज़ी से आकर्षित कर रहा है पर मै उनको सावधान ज़रूर करना चाहूँगा... ! ये दुनिया आपके गुणों को नहीं देखती है और अन्दर एक घटिया राजनीति है ।
मेरा नाम विवेक शांडिल्य है और मैंने कुछ समय पहले ही पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा है । पहले मै काफी उत्साहित था की मुझे मौका मिलेगा देश के लिए कुछ करने का । बहुत मशक्कत करने क बाद मैंने इस क्षेत्र में एक संस्थान में दाखिला कराया । कोर्स फी सुन के तो एक पल के लिए मैंने अपना कदम पीछे हटा लिया लेकिन मेरे भैया ने मुझे सपोर्ट किया और प्रोत्साहित भी किया । तब मै इस क्षेत्र के बारे में मै बहुत कम जानता था और मै उत्साहित भी था । लेकिन समय बीतता गया और परत दर परत मीडिया की असलियत सामने आती गयी । और धीरे धीरे मुझे पता चलने लगा के जो क्षेत्र मैंने चुना है उसमे सड़ांध अपने चरम पर है ।
मीडिया जिसे हम लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ का चौथा स्तम्भ, समाज का प्रहरी और न जाने क्या क्या कहते है लेकिन इस स्तम्भ के सरिये में जंग लग चुका है । ऐसी व्यवस्था जिसमे खुद एक बड़ा होल है वो समाज की व्यवस्था का होल कैसे भरेगी । आप मेरा इशारा समझ रहे होंगे । आज मै एक चैनल में समाचार वाचक (न्यूज़ एंकर) के रूप में काम करता हूँ और आगे बढ़ने की कोशिश भी करता हूँ पर मेरे कोशिश को उस समय एक बड़ा धक्का लगता है जब मुझसे मेरे गुण के बजाय मुझसे बाद में आने को कहा जाता है यहाँ तक की सी.वी को गार्ड के पास जमा करने को कहा जाता है और बाद में उस सी.वी का सदुपयोग उसे टुकड़ों में बाँट, पर्ची के तौर पर किया जाता है। लेकिन इन सब के बीच एक शब्द है जैक जिसके बारे में मै अपने दोस्तों से हमेशा सुनता हूँ । मुझसे कहा जाता है की अगर कम्पनी में कोई जान- पहचान का हो तो उससे बात करो तुम्हे नौकरी मिल जाएगी । क्या मीडिया ने ऐसे समाज का निमार्ण किया है जिसमे गुणों का कोई महत्व नहीं होगा जहां रिश्तों को महत्व दी जायेगी, परिवारवाद चलेगा . अगर आप किसी न्यूज़ एंकर, रिपोर्टर, या किसी मीडियाकर्मी के घर पैदा हुए हैं तो आपको चिंता करने की ज़रुरत नहीं है । और अगर आपकी नौकरी बिना किसी रिश्ते के हो जाती है तो वाकई भगवान् आप पर मेहरबान है। जो व्यस्था खुद बीमार है वो समाज को स्वास्थ्य कैसे बना सकता है । धन्यवाद
Saturday, August 7, 2010
भारत एक ऐसा देश जहां इसके नाम से ही इसकी विशालता झलकती है ,.... और पिछले कुछ वर्षो में हमने ये साबित भी किया है के हम दुनिया के सबसे बड़े गंणतंत्र क्यूँ है और पूरा विश्व हमारी ताक़त जानता है । पर कुछ लोग लगे हैं हमारी इसी छवि के साथ खिलवाड़ करने में .... जी हाँ आज हम बात करने वाले है राष्ट्र मंडल खेलों के बारे में..... और इसके साथ शुरू हुए भ्रष्टाचार के घिनौने खेल के बारे में..... । खेल अभी शुरू भी नहीं हुआ की इसे भ्रष्टाचार के कफन में सुलाने की तैयारी कर ली देश के कुछ नौ निहालों ने..... और लग गए अपने घरों को आबाद करने में और आम जनता के पैसो को लूटने में वो भी बिना शर्म के क्योंकि बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया......
Thursday, July 29, 2010
भूख का गंणतंत्र
क्या हमने कभी सोचा है के महंगाई क्यूँ बढ़ रही है ? क्यों रोज़मर्रा के चीज़ों के दाम फर्श से अर्श तक चले गए ? शायद इनका जवाब देश के हर सख्श, हर जनता को चाहिए....
Tuesday, May 4, 2010
Friday, April 16, 2010
कहाँ जांए हम
खेल गाँव बनकर लगभग तैयार है और गगन छूती इमारतें देखने में शानदार लग रही है । लेकिन क्या हमने कभी ये सोचा है की उन हज़ारों गरीब मजदूरों का. जिन्होंने अपने खून पसीने और मेहनत से सालों में इसे तैयार किया।
सरकार का क्या रूख है इन मजदूरों के लिए इसका कुछ पता नहीं लेकिन ये तो ज़रूर है की जब यह काम ख़त्म हो जाएगा तो यहाँ रह रहे इन हज़ारो लोगों को उनका उचित अधिकार नहीं मिल पायेगा । क्योंकि सीधी सी बात है की अपने आँगन में गंदगी किसी को पसंद नहीं होती है वो चाहे आप हो या हम । दिल्ली सरकार के सामने यह एक बहुत बड़ी चुनौती होगी की इनके विस्थापन का सही इंतजाम हो ।
सरकार का क्या रूख है इन मजदूरों के लिए इसका कुछ पता नहीं लेकिन ये तो ज़रूर है की जब यह काम ख़त्म हो जाएगा तो यहाँ रह रहे इन हज़ारो लोगों को उनका उचित अधिकार नहीं मिल पायेगा । क्योंकि सीधी सी बात है की अपने आँगन में गंदगी किसी को पसंद नहीं होती है वो चाहे आप हो या हम । दिल्ली सरकार के सामने यह एक बहुत बड़ी चुनौती होगी की इनके विस्थापन का सही इंतजाम हो ।
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