क्या होगा... सोच के भी रूह काँप जाती है
नवम्बर २००३ । ये वो माह था जब भारत में राष्ट्रमंडल के खेलों के आयोजन का रास्ता साफ़ हो गया । लेकिन हमारी नेताओ की जेब भरे तब तो वो भारत या राष्ट्र के बारे में सोचे । यहाँ के नेता राष्ट्र हित से पहले स्वार्थ हित को रखते है जो की समस्या का मूल जड़ है । डर लगता है कहीं राष्ट्र मंडल खेल राष्ट्रीय शर्म न बन जाए और हमारी छवि विश्व पटल पर ख़राब न हो जाये । हमने अपनी छवि बनाने के लिए बहुत मेहनत की है और इसपर एक भी दाग बर्दास्त नहीं किया जाएगा । ताज़ा घटना जवाहर लाल नेहरु स्टेडियम का है जहां निर्माणाधीन फुट ओवरब्रिज ढह गया। इस हादसे में 23 मजदूर घायल हो गए हैं जिनमें पांच की हालत बेहद गंभीर है। इस स्टेडियम में ही कॉमनवेल्थ गेम्स की ओपनिंग है। बाद में भी कई अहम आयोजन यहां होने हैं। इस फुट ब्रिज को विशेष तौर से कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए ही तैयार किया जा रहा है। इस ब्रिज का इस्तेमाल खेलों के दौरान एथलीटों द्वारा किया जाना है। वहीँ दूसरी तरफ खेल गाँव में बने फ्लेट्स की हालत भी चिंताजनक है, न्यूजीलैंड, स्कॉटलैंड, कनाडा और इजरायल ने अपने-अपने दलों के लिए आवंटित आवासों में घटिया रखरखाव और खराब बंदोबस्त की शिकायत की है। खिलाडियों के दल गुरूवार से खेल गांव में पहुंचना शुरू हो जाएगा। भारत में 1982 में हुए एशियाई खेलों के बाद यह देश का सबसे ब़डा आयोजन है। इस आयोजन में 71 देशों के लगभग 7,000 खिलाडियों और अधिकारियों के हिस्सा लेने की संभावना है।
मैं एक बार फिर दोहराना चाहूँगा की हमने अपनी छवि को को बनाने में बहुत कुछ खोया है और जो कोई भी इसे ख़राब करने की कोशिश करेगा या किया है उसे बुरे अंजाम भुगतने होंगे...
धन्यवाद...
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