हिंदी ...
"हिंदी हैं हम वतन है हिन्दुस्तां हमारा" ये चंद शब्द ऐसे है जो आय दिन हमारे कान में पड़ते रहते है, अभी हिंदी पखवाडा मनाया जा रहा है वैसे तो हम स्वतंत्रता दिवस भी मानते है और न जाने कितने तरह के दिवस लेकिन सिर्फ दिवस के दिन ही विषय याद रखा जाता है। चलिए लौटते हैं विषय पर हिंदी...
कहते है भाषा माँ होती है और फिर हिंदी हो, मराठी हो या अंग्रेजी, भाषा कसी राष्ट्र या प्रदेश के विकास में बाधक नहीं हो सकती है। और जो लोग इसे अपना हथियार बनाते है उनका मकसद साफ़ होता है..... स्वार्थ...
विडम्बना की बात ये की देश के शीर्ष में बैठे कुछ लोग जो देश के प्रतिनिधि है वो भी हिंदी से डरते है और देश में एक तबका ऐसा भी जो हिंदी में बात करना अपमानजनक समझता है।
भाषा की व्यापकता दर्शाता है की हमारा राष्ट्र कितना समृद्ध है । सिर्फ भारत ही एक ऐसा देश है जहा पर हर प्रान्त में अलग अलग भाषाए बोली जाती है, फिर भी हिंदी हमारी मुख्य भाषा है । भारत हिंदी में सोचता है, हिंदी में बोलता है, हिंदी में सुनता है और हिंदी में ही गुनता है । गाँधी जी समझते थे की हिंदी में योजक क्षमता ज्यादा है इसलिए उन्होंने १९०९ में ही लिखा था "हिन्दुस्तान की राष्ट्र भाषा हिंदी ही होनी चाहिए "
अगर बात की जाये अंग्रेजी की तो भारत में अंग्रेजी का मुकाबला हिंदी से हो ही नहीं सकता क्योंकि अगर ऐसा होता तो भारत की फिल्म इंडस्ट्री ६०-६५ हज़ार कड़ोर के पार नहीं होती। वर्ष १९४९ की बात की जाये तो भारत के नए महाराजाओ ने अंग्रेजी को महारानी और हिंदी को नौकरानी घोषित कर दिया था लेकिन हिंदी फिर भी पंख फैला कर उडी। क्योंकि भारत में हिंदी व्यापर की भाषा है, सुचना और संचार की भाषा है, राजनितिक प्रचार की भाषा है। हिंदी ने इंग्लिश, मराठी, तमिल, तेलगु, भोजपुरी इन सभी भाषाओ को अपनाया है । उर्दू पहले से ही हिंदी के आँचल में है और विदेशी अंग्रेजी भी पुरे ठिठाई के साथ हिंदी के अंत क्षेत्र में हेन्ग्लिश (हिंदी+इंग्लिश) बनकर समां गयी । हिंदी सर्व समावेशी है, हिंदी ज्ञान की भाषा है हिंदी विज्ञानं की भाषा है संस्कृत और दर्शन की भाषा है ।
भारत हिंदी में खेलता है हिंदी में पलता है हिंदी में हँसता है और गुंडाराज के थप्पड़ खाकर हिंदी में ही रोता है सबसे बड़ी बात ये है की हिंदी भारत के मन की भाषा है।
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