Wednesday, January 25, 2012

एक खिलाड़ी ऐसा भी था...


मेजर ध्यानचंद

 एक खिलाड़ी ऐसा भी था...

भारतीय खेल जगत में मेजर ध्यान चंद का नाम अविस्मरणीय ही नहीं अद्वीतीय भी है। ध्याचंद को फुटबॉल में पेले और क्रिकेट में सर डॉन ब्रैडमैन के बराबर माना जाता है। गेंद उनकी स्टिक से इस कदर चिपकती थी कि विरोधीयों को लगता था कि वो जादुई स्टिक से खेल रहे हैं। यहां तक हॉलैंड में उनकी स्टिक में चुंबक होने की आशंका में उसे तोड़ कर देखा गया था। तो जापान में लोगों को लगता था कि उनकी स्टिक में गोंद लगी हुई है। ऐसे कई किस्से इस खेल के इस जादुगर के नाम हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि विरोधी टीम भी मेजर के खेल को देखने में ही मश्गूल हो जाती थी। उनकी कलाबाजी से मोहित होकर जर्मनी के रुडोल्फ हिटलर ने उन्हे जर्मनी के तरफ से खेलने की पेशकश तक कर दी थी। लेकिन ध्यानचंद ने हमेशा ही भारत के लिए खेलना अपना गैरव समझा। उनके करियर पर एक नजर डाले तो ध्यानचंद ने तीन ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और तीनों ही बार देश को स्वर्ण पदक दिलाया। आंकड़े भी गवाही देते हैं कि वो वाकई में हॉकी के जादुगर थे। भारत ने 1932 में 37 मैच में 338 गोल किए जिसमें 133 गोल ध्यानचंद के थे। दूसरे विश्वयुद्ध से पहले मेजर ने 1928 एम्सटर्डम, 1932 लॉस एंजिल्स, और 1936 में लगातार तीन बार ओलंपिक के हॉकी में भारत को गोल्ड मेडल दिलवाए। दूसरा विश्व-युद्ध अगर न होता तो 6 बार ओलंपकि में शिरकत करने वाले वो संभवत विश्व के पहले खिलाड़ी होते और ये भी तय होता कि भारत को सभी 6 ओलंपिकों में गोल्ड मेडल ही हासिल होता। हॉकी के इस जादुगर के मुरीद न सिर्फ हिटलर थे बल्कि क्रिकेट के महान खिलाड़ी सर डॉन ब्रैडमैन भी थे। खास बात ये है कि इन दोनो महान हस्तियों का जन्म दो दिन के अंदर ही पड़ता है। 27 अगस्त को ब्रैडमैन तो 29 अगस्त को मेजर की जन्मशती मनाई जाती है जिसे भारत में खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। सन् 1956 में उन्हे पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। भारतीय ओलंपकि संघ ने उन्हे शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था। इस महान खिलाड़ी के जादू ने न सिर्फ देश बल्कि पूरे विश्व को अपना दीवाना बनाया। यही वजह है कि मेजर ध्यानचंद को हॉकी का जादूगर कहा गया।

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