57 सीटों पर चुनाव के बाद क्या है समीकरण?
देश में इस वक्त एक ऐसी सरकार
है जो कि 2 साल पहले
प्रचंड बहुमत के साथ लोकसभा में आई। लेकिन फिर भी ये एक गठबंधन सरकार है। कोशिश ये
थी कि लोकसभा के ज्यादा से ज्यादा सीटों पर वर्चस्व कायम हो और कामकाज में सरकार
को परेशानी ना हो। कोशिश कामयाब भी है। सरकार को लोकसभाा में काम करने में कोई
परेशानी नहीं होती चाहे माहौल कितना भी गर्म क्यों ना हो फिर भी बिल तो पास
हो ही जाते हैं। क्योंकि सत्ता पक्ष के पास यहां संख्याबल है।
दरअसल मामला पलट जाता है
राज्यसभा में जाकर। सरकार के लिए राहत की बात ये है कि राज्यसभा में एक चौथाई
सीटों पर नए सिरों से चुनाव होने के बाद BJP मॉनसून सत्र में माहौल अपने पक्ष में होने की उम्मीद कर रही है। इससे अहम
बिलों को पास कराने में मदद मिलेगी।
उपरी सदन में सीटों की संख्या
है 250, सामान्य
बहुमत के लिए संख्या चाहिए 122 और किसी भी बिल को पास कराने
के लिए सदन में दो तिहाई बहुमत की जरुरत होती है यानी 162 सांसदों
का सपोर्ट सरकार के पास होना चाहिए। तो अब सवाल ये कि क्या ये जादूई आंकड़ा मौजूदा
सरकार छू सकती है। तो क्या है गणित राज्यसभा का आईए जानते हैं।
राज्यसभा की 57 सीटों पर चुनाव के बाद नतीजे सामने
आ चुके हैं। मौजूदा तस्वीर में UPA और उसके करीबी दलों की
संख्या है 86(निर्दलीय को जोड़ कर) और NDA और उसके करीबी दलों की संख्या है 84(निर्दलियो को
जोड़कर), इनमें से केवल NDA के सांसदों
की संख्या 74 है। लेकिन 37 ऐसे दलों के
सासंद जो ना BJP की तरफ हैं और ना ही कांग्रेस की तरफ। इसमें
नॉमिनेटेड, निर्दलिय, TMC, और BJD
जैसे दल हैं। इन दलों पर पकड़ बनाकर सरकार की राह इस सदन में
आसान हो सकती है। लेकिन मसला ये है कि इनमें से 35 ऐसे सांसद
हैं जो उन दलों से हैं जो BJP विरोधी राजनीति के लिए जाने
जाते हैं। व
हीं इस सदन में बीजेपी के लिए
अच्छी खबर ये है कि यहां पार्टी ने पहली बार 50 के आंकड़े को पार किया है , क्योंकि हाल के विधानसभा
चुनावों में BJP ने अच्छा परफॉर्म किया है। हांलाकि
असम में हुए चुनाव का पार्टी फायदा नहीं ले सकी क्योंकि वहां विधानसभा चुनाव से
पहले राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव हो गए थे।
GST का क्या होगा?
ये सवाल इस लिए भी है क्यूंकि इस बिल को लंबे समय
से सरकार पास कराने की सरकार कोशिश कर रही है। केंद्र के लिए राहत की बात ये
है कि शीैतकालीन (2015) सत्र में
कांग्रेस और लेफ्ट के छोड़ कर सभी दल इस बिल के समर्थन में नज़र आ रहे थे। वहीं DMK
पशोपेश में, सरकार की थोड़ी कोशिश पर उसे इस
दल का साथ मिल सकता है। वैसे लेफ्ट भी इस मामले में लेफ्ट का रुख नरम हुआ है। जो
कि बिल के लिए अच्छा संकेत माना जा सकता है। वहीं GST सपोर्ट
करने वाले 15 सांसद राज्यसभा में आए हैं।
लेकिन ये सब इतना आसान भी
नहीं होने जा रहा है। सदन के नियम के मुताबिक बिल को पास कराने के लिए सदन का
ऑर्डर में रहना ज़रुरी है। अगर कांग्रेस बिल के विरोध में अड़ी रहती है तो हंगामे
के चलते बिल फंस सकता है। राज्यसभा से पास होने के बाद इस बिल को 15 राज्यों के विधानसभा से भी गुज़रना होगा
जो मौजूदा हालात में सरकार के लिए ज्यादा मुश्किल नहीं है।
राज्यसभा में अटके पड़े बिल।
वैसे तो राज्यसभा में लंबित
पड़े बिलों की फेहरिस्त लंबी है। शीतकालीन सत्र की बात करें तो राज्यसभा से केवल 4 ही बिल पारित कराए जा सके बाकी सदन
की कार्यवाही हंगामे की भेंट चढ़ गई। इस पर संसदीय कार्यमंत्री वैंकय्या नायडू ने
कहा--
“संसद के शीतकलीन सत्र के दौरान राज्यसभा में केवल चार ही विधेयक पारित हो
पाए जबकि 13 विधेयक अभी भी लंबित हैं। लगातार हंगामे के कारण
राज्यसभा की कार्यवाही बाधित हो रही है। इसलिए संसदीय कार्यमंत्री एम वेंकैया
नायडू ने राज्यसभा के सदस्यों से अनुरोध किया कि ज्यादा से ज्यादा विधेयक पारित
कराए।”
लेकिन लगता है वैंकय्या जी को पता नहीं कि राज्यसभा
में अभी 45 विधेयक
लंबित हैं और उनमें से कुछ तो करीब 30 साल पहले ही सदन में
पेश किए गए थे। वहीं लोकसभा में मई में समाप्त सत्र तक पांच विधेयक ऐसे थे,
जिनका निपटारा किया जाना है।
व्हिसिल ब्लोअर सुरक्षा विधेयक भी लंबित
एक अन्य प्रमुख विधेयक व्हिसिल ब्लोअर सुरक्षा
(संशोधन) विधेयक, 2015 भी
सदन में लंबित है। यह विधेयक पिछले साल दिसंबर में पेश किया गया था और इस पर चर्चा
अभी पूरी नहीं हुई है। इस साल के दोनों सत्रों में इस विधेयक पर आगे चर्चा नहीं हो
सकी। वहीं लोकसभा में लंबित महत्वपूर्ण विधेयकों में उपभोक्ता संरक्षण विधेयक 2015
और बेनामी लेनदेन (निषेध) संशोधन विधेयक, 2015 शामिल हैं।
इससे पहले वित्तमंत्री अरुण जेटली ने संकेत दिया था
कि संसद के अगले सत्र में जीएसटी विधेयक की दिशा में प्रगति हो सकती है। इसके साथ
ही उन्होंने भरोसा जताया था कि विधेयकों का समर्थन करने वाले दलों की शक्ति
राज्यसभा में बढ़ने से 'विधायी
कार्यों' में तेजी आएगी और कार्यवाही में व्यवधान पैदा नहीं
होगा। उनसे राज्यसभा के लिए हाल में हुए चुनाव के परिणाम में कांग्रेस के सदस्यों
की संख्या में कमी आने और जीएसटी विधेयक की संभावना के बारे में पूछा गया था।
मुख्य विपक्षी पार्टी जीएसटी विधेयक का विरोध कर रही है और कुछ संशोधनों की मांग
कर रही है।
1987 में पेश विधेयक भी अब तक लंबित
संसद के पिछले कुछ सत्रों में हंगामेदार स्थिति रही
थी, लेकिन सरकारी कामकाज के लिहाज से
पिछले सत्र के कामकाज में सुधार हुआ। हालांकि लंबित विधेयकों की समस्या एनडीए
सरकार के दो साल तक ही सीमित नहीं है। कुछ विधेयक तो दशकों से लंबित हैं। इनमें
भारतीय चिकित्सा परिषद (संशोधन) विधेयक, 1987, प्रबंधन में
कामगारों की हिस्सेदारी विधेयक 1990 और संविधान (79वां संशोधन) विधेयक, 1992 शामिल हैं। चिकित्सा परिषद
विधेयक पर संयुक्त समिति की रिपोर्ट जुलाई 1989 में पेश की
गई थी, वहीं कामगार प्रबंधन विधेयक पर संसद की स्थायी समिति
की रिपोर्ट विधेयक पेश होने के 11 साल बाद यानी दिसंबर 2001
में राज्यसभा में पेश की गई।
अन्य प्रमुख लंबित विधेयकों
में वक्फ संपत्ति (अनधिकृत कब्जे से मुक्ति) विधेयक,
2014, भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक, 2016 शामिल
हैं। उच्च सदन में लंबित विधेयकों में निजी जासूसी एजेंसियां (नियमन) विधेयक,
2007 शामिल है। गृह मंत्रालय से संबंधित इस विधेयक पर स्थायी समिति
की रिपोर्ट फरवरी 2009 में ही पेश कर दी गई थी।
राज्यसभा को लेकर BJP की बांछे खिली हुईं हैं। जुलाई के
आखिरी हफ्ते में शुरू हो रहे मॉनसून सत्र का पूरा फायदा उठाने की तैयारी है। 54
सांसदों के विदाई के मौके पर PM ने भी कहा था
कि आने वाले समय में हालात बदलेंगे। लेकिन एक सच्चाई ये भी है कि उपरी सदन यानी के
राज्यसभा में आज भी कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है।
(त्रुटि दिखने पर मुझे मेल करें,
धन्यवाद)

1 comment:
बहुत इंफर्मेटिव
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