भ्रष्टाचार पर सरकारों के दावे और हकीकत!
हाल में जब PM मोदी जी जब कतर में बलो रहे थे तब उन्होने भ्रष्टाचार को लेकर कई दावे किए। स्कूल से लेकर राशन कार्ड तक तरह तरह की कहानियां सुनाईं। बहरहाल साधारण सी बात है कि वो ये बता रहे थे कि उन्होंने सफाइ का काम शुरू कर दिया है और इसमें थोड़ा वक्त लगेगा। जो बात वाजिब भी नज़र आती है। क्योंकि इसकी जड़ें अपने देश में काफी मज़बूत हैं। लेकिन क्या वाकई भष्टाचार के इस दानव को कुचलने के लिए सही हथियार इस्तेमाल किए जा रहे हैं या यूं कहें कि क्या वाकई सरकार के पास वो हथियार हैं जो करप्शन पर नकेल कसने के लिए काफी है। मेरी मानें तो ऐसा लगता नहीं है। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार काम नहीं कर रही रही है लेकिन रफ्तार और माध्याम को लेकर सवाल है। दरअसल करप्शन को लेकर आज तक सरकारों ने हमें इतना मूर्ख बनाया है कि हमें पता ही नहीं कि हम इस दलदल में कहां तक धंस चुके हैं। तो चलिए पड़ताल करते हैं। शायद आपको जानकर हैरानी हो कि भ्रष्टाचार से निपटने की व्यवस्था करने संस्थाएं और पारदर्शी ढांचा तैयार करने के मामले में हम उन 175 देशों में सबसे पीछे हैं जिन्होंने साल 2003 में संयुक्त राष्ट्र की भष्टाचार रोधी संधी पर दस्तखत किए थे। हमसे आगे वो मुल्क है जिसे हम पानी पी पी कर कोसते है। जी हां पाकिस्तान। इसके अलावा मलेशिया इंडोनेशिया भूटान और वियतनाम जैसे देश भी हमसे आगे हैं।थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं। आपको शायद याद हो साल 2011 में करप्शन लोकपाल और राजनीति तीनों आमने सामने थे ऐसा लग रहा था मानो अपने देश से इसका सफाया बस होने ही वाला था। लेकिन आलम तो ये है कि लोकपाल के गीत गा गा कर बनी सरकार भी लोकपाल को भूल गई। बाकियों को तो छोड़ ही दीजिए पर इस रेलम पेल का नतीजा ये रहा कि लोकपाल कानून साल 2014 से तकनीकि तौर पर लागू है लेकिन लोकपाल महोदय कहां हैं? किसी को नहीं पता।
दिसंबर 2014 में मोदी सरकार ने लोकपाल कानून को संशोधन और पुनर्विचार के लिए कानून मंत्रालय के संसदीयसमिती को सौंप दिया। एक साल बाद दिसंबर 2015 में इस समिती ने केंद्रीय सतर्कता आयोग और CBI की भ्रष्टाचार रोधी विंग को लोकपाल के दायरे में लाने कि सिफारिश सरकार को सौंप दी। इसके बाद की कहानी नहीं पता। ना तो कानून का पता और ना ही उनलोगों का जो लोकपाल के नाम पर दिन रात आंदोलन और धरना करते थे। केंद्र सरकार ने भी इसपर अब तक कोई ठोस जानकारी नहीं दी।
ये तो रही लोकपाल की बात लेकिन UN की संधी के मुताबिक सरकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ पांच और कानून बनाने थे।
1- भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाले की सुरक्षा के लिए व्हिसलब्लोअर बिल
2- सरकारी सेवाओं मेें भ्रष्टाचार रोकने के लिए भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन का विधेयक
3- नागरिक सेवाओं से जुड़े अधिकारों के लिए सिटिजन चार्टर एंड ग्रीवांस रिड्रेसल बिल
4- अदालतों में पारदिर्शिता के लिए ज्युडिशयल अकाउंटिबिलिटि बिल
5- विदेशी अधिकारियों और अंतराष्ट्रीय संगठनों में रिश्वतखोरी रोकने के लिए विधेयक
इन्हे लेकर पिछले दो सला में सरकार की नीति स्पष्ट नहीं रही है। और न ही सरकार ने कोई दृढ़ मंशा दिखाई है। साफ है कि आज़ादी से लेकर अब तक भ्रष्टाचार को खत्म करने के नाम पर सरकारों ने नूरा कुश्ति ही कि है। और सियासी पार्टियों ने लोगों को मूर्ख बना कर लोगों का वोट हासिल किया है। भ्रष्टाचार को रोकने के लिए मज़बूत और स्वतंत्र मॉनिटरिंग एजेंसी, भ्रष्टाचार की नियमित जांच परख, जांच के लिए पर्याप्त ढांचा और तकनीक, और भ्रष्टाचार पर तेज़ फैसले देने वाली अदालतें। लेकिन डब आप भारत की तरफ देखेंगे तो आपको इनमें से कुछ भी नहीं दिखेगा। यहां तो अभी तक बुनियाद ही नहीं है इमारत काा सवाल ही पैदा नहीं होता। UN के साथ संधि किए 13 साल गुज़र चुके हैं लेकिन किसी भी सरकार ने वो इच्छा संकल्प या यूं कहे कि मंशा ही नहीं दिखाइ जिससे लोगों को ऐसा लगे कि मामला भ्रष्टाचार की टहनियों तक नहीं, जड़ों तक पहुंच गया है।
1 comment:
पीएम मोदी का पिछले रिकार्ड बताता है की भ्रष्टाचार को लेकर मोदी सिर्फ भाषणबाज़ी करते हैं. गुजरात में लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं की . मोदी के सीएम रहते सीएजी ने भ्रष्टाचार का खुलासा किया था , लेकिन कोई जांच नहीं हुई , अडानी को ज़मीन दिए जाने से लेकर आनंदी की ज़मीन तक --- घोटाला ही घोटाला ... दरअसल मोदी के लिए भ्रष्टाचार की परिभाषा है ऐसा भ्रष्टाचार जिससे कांग्रेस पार्टी का रिश्ता हो ... बाकी सब शिष्टाचार है
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