गंगा नदी हम भारतीयो की आस्था का प्रतीक रही तथा है और गंगा के जल को अमृत का दर्जा दिया गया है । हमारे धार्मिक ग्रन्थों मे लिखा गया है कि गंगा के पानी मे स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं ! उसकी पवित्रता केवल आध्यात्मिक दृष्टी से ही नहीं बलिक भौतिक कारणों से भी उसका जल इतना पवित्र स्व्च्छ हुआ करता है लेकिन अब यह प्रदुषण की चपेट में आकर अपना भौतिक चमत्कार खो रही है ! गंगा के उदगम स्थान गंगोत्री से लेकर गंगा सागर में मिलने तक के विभिन्न स्थानो पर उसका जल लगातार प्रदुषित किया जा रहा है ! कुछ स्थानो पर तो पानी नहाने लायक भी नहीं रहा है ! गत दो द्शको से गंगा की सफ़ाई सरकारी तथा गैरसरकारी स्तरों पर होती रही है और विशेषज्ञों के अनुसार जल स्थिति में कुछ सुधार के लक्षण भी दिखलाई दिए हैं ,पर काम करने वाले लोग गंगा नदी में हाथ धोने के आदी हैं और धोते रहते हैं ! पानी सिर्फ़ अब उपभोग की वस्तु बन कर रह गया है ! एक तरफ़ ग्लेशियर सिकुडे है वहीं दूसरी तरफ़ गंगा की धारा में भी अब वह आवेग कंहा है? गंगा जल मे घुलित आक्सीजन की मात्रा लगातार कम होती गई है !
डर तो इस बात का है कि गंगा अपनी बहन यमुना की भांति ना हो जाए ! इसी कारण इसकी सफ़ाई की ओर ध्यान देना जरुरी है ! 1985 के एक्शन प्लान के तहत नदी की सफ़ाई के प्रयासों पर 900 करोड रु खर्च किए गए ! लेकिन इसके नतीजे अच्छे नहीं रहे है ! अब तो केन्द्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय नदी घोषित करने का फ़ैसला लिया है ! सभी राज्यों के मुख्यमंत्री इसके सदस्य होंगे और उठने वाली समस्याओं का समाधान एक साथ करेंगे ! सरकार ने नई पहल के जरिए इसे स्वच्छ – प्रदुषण मुक्त बनाने का बीडा उठाया है पर भारत मे काम सिर्फ़ कागजों पर हि होते है ।
शायद भारतीय इस नदी को माँ तो कहते है पर माँ का दर्जा देना भूल गये है । जरुरत है हमें इसे ना सिर्फ़ मा कहने की पर माँ जैसा ख्याल भी रखने की तभी हम अपने मां को स्वस्थ और सुरक्षित बना पायेंगे ।
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