गुणवत्ता नहीं रिश्तेदार चाहिए...
मीडिया एक ऐसा क्षेत्र जो की रंगों की चकाचौंध से भरपूर है और अपने तरफ आज के युवाओं को अपने ओर बहुत तेज़ी से आकर्षित कर रहा है पर मै उनको सावधान ज़रूर करना चाहूँगा... ! ये दुनिया आपके गुणों को नहीं देखती है और अन्दर एक घटिया राजनीति है ।
मेरा नाम विवेक शांडिल्य है और मैंने कुछ समय पहले ही पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा है । पहले मै काफी उत्साहित था की मुझे मौका मिलेगा देश के लिए कुछ करने का । बहुत मशक्कत करने क बाद मैंने इस क्षेत्र में एक संस्थान में दाखिला कराया । कोर्स फी सुन के तो एक पल के लिए मैंने अपना कदम पीछे हटा लिया लेकिन मेरे भैया ने मुझे सपोर्ट किया और प्रोत्साहित भी किया । तब मै इस क्षेत्र के बारे में मै बहुत कम जानता था और मै उत्साहित भी था । लेकिन समय बीतता गया और परत दर परत मीडिया की असलियत सामने आती गयी । और धीरे धीरे मुझे पता चलने लगा के जो क्षेत्र मैंने चुना है उसमे सड़ांध अपने चरम पर है ।
मीडिया जिसे हम लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ का चौथा स्तम्भ, समाज का प्रहरी और न जाने क्या क्या कहते है लेकिन इस स्तम्भ के सरिये में जंग लग चुका है । ऐसी व्यवस्था जिसमे खुद एक बड़ा होल है वो समाज की व्यवस्था का होल कैसे भरेगी । आप मेरा इशारा समझ रहे होंगे । आज मै एक चैनल में समाचार वाचक (न्यूज़ एंकर) के रूप में काम करता हूँ और आगे बढ़ने की कोशिश भी करता हूँ पर मेरे कोशिश को उस समय एक बड़ा धक्का लगता है जब मुझसे मेरे गुण के बजाय मुझसे बाद में आने को कहा जाता है यहाँ तक की सी.वी को गार्ड के पास जमा करने को कहा जाता है और बाद में उस सी.वी का सदुपयोग उसे टुकड़ों में बाँट, पर्ची के तौर पर किया जाता है। लेकिन इन सब के बीच एक शब्द है जैक जिसके बारे में मै अपने दोस्तों से हमेशा सुनता हूँ । मुझसे कहा जाता है की अगर कम्पनी में कोई जान- पहचान का हो तो उससे बात करो तुम्हे नौकरी मिल जाएगी । क्या मीडिया ने ऐसे समाज का निमार्ण किया है जिसमे गुणों का कोई महत्व नहीं होगा जहां रिश्तों को महत्व दी जायेगी, परिवारवाद चलेगा . अगर आप किसी न्यूज़ एंकर, रिपोर्टर, या किसी मीडियाकर्मी के घर पैदा हुए हैं तो आपको चिंता करने की ज़रुरत नहीं है । और अगर आपकी नौकरी बिना किसी रिश्ते के हो जाती है तो वाकई भगवान् आप पर मेहरबान है। जो व्यस्था खुद बीमार है वो समाज को स्वास्थ्य कैसे बना सकता है । धन्यवाद
3 comments:
100% right....i agree...par ab jab is field me kadam rakha hai to ise aise nahi chhodenge,,,,stambh me lage daag ko hum chhudayenge....
well said rajeev....
par dagar kathin hai......
वैलकम टू द मीडिया वर्ल्ड...ये एक बड़ा सच ज़रुर है लेकिन पूरा और केवल यही सच नहीं वर्ना...इसे आपसे बेहतर कौन जानेगा..इतनी जल्दी भूल गए..पहला सबक..शिखर को पाना कठिन है...बहुत धैर्य का काम है...उस तक पहुंच जाओ तो ठहरना मुश्किल है...ठहर जाओ तो संभलना मुश्किल है..पर मेरा शेर मिट्टी का नहीं है...रत्न को पृथ्वी के गर्भ में कितना भी नीचे दबा दो वो अपनी चमक नहीं खोता..
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