Friday, September 24, 2010

इंसान जो तजुर्बे से नहीं सीखता...

पंडित जवाहर लाल नेहरु- १९३५

आजकल अखबारों में लाहोर की शहीदगंज मस्जिद की प्रतिदिन कुछ न कुछ चर्चा होती है । शहर में काफी खलबली मची हुई है । दोनों तरफ मज़हबी जोश दिखता है । एक दूसरे पर हमले होते है, एक दूसरे की बद्नीयतें की शिकायत होती है और बीच में एक पंच की तरह अँगरेज़ अपनी हुकूमत की ताक़त दिखाती है। मुझे न तो वाक़यात ही ठीक ठीक मालूम है की किसने ये सिलसिला पहले छेड़ा था या किसकी गलती थी औं न ही इसकी जांच करने का मेरा कोई इरादा है । इस तरह के धार्मिक जोश में मुझे दिलचस्पी भी नहीं है । लेकिन दिलचस्पी हो या न हो जब वह दुर्भाग्य से पैदा हो जाये, तो उसका सामना करना पड़ता है । मई सोचता था की हम लोग इस देश में कितने पिछड़े हुए है की अदना सी बात पर जान देने को उतारू हो जाते है, पर अपनी गुलामी और फाके मस्ती सहने को तैयार रहते है ।
इस मस्जिद से मेरा ध्यान दूसरी तरफ जा पंहुचा । वह बहुत प्रसिद्द और ऐतिहासिक मस्जिद है और करीब चौदह सौ वर्ष से करोडो निगाहें उसकी तरफ देखती आई है । वो इस्लाम से भी लम्बी है और उसने अपनी लम्बी जिंदगी में न-जाने क्या-२ देखा है। बुज़ुर्गी और शान उसके एक एक पत्थर से टपकती है । क्या सोचते होंगे उसके पत्थर, जब ऊँचाई से मनुष्यों की भीड़ को देखते होंगे। बच्चों के खेल, बड़ों की लड़ाई, फरेब और बेवकूफी ? हजारों वर्षों में इन्होने कितना कम सीखा ! और कितने दिन लगेंगे की इन्हें अक्ल आये और समझ आये।
ईसा की चौथी सदी ख़त्म होने वाली थी जब कोंस्टेंतिनोपुल (कुस्तुनतुनिया) का जन्म हुआ । कुस्तुन्तुनिया में सम्राटों की आगया से बड़ी-२ इमारतें बनी और बहुत जल्द वो एक विशाल नगर हो गया। उस समय यूरोप में कोई दूसरा शहर उसका मुकाबला नहीं कर सकता था- रोम भी तेज़ी से पिछ्ड गया था । वहां की इमारते नयी तर्ज़ पर बनी , भवन बनाने में नयी कला का आगमन हुआ, जिसमे मेहराब, गुम्बज, बुर्जिया, खम्भे, इत्यादि शामिल थे। ये इमारती कला बंजेटाईंन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। और छठी सदी में कुस्तुनतुनिया में एक आलिशान कैथीड्रल चर्च इस कला से बनाया गया जो सेंत सेफिया के ना से मशहूर हुआ। सेंत सेफिया का कैथिद्रिल ग्रीक चर्च धर्म का केंद्र था और नौ सौ वर्षों तक ऐसा ही रहा।
पंद्रहवी शताब्दी में उस्मान्वी तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया पर फतह पाईनतीजा ये हुआ की वहां का सबसे बड़ा कैथीड्रल चर्च जो इसाई धर्म का केंद्र था वो अब सबसे बड़ी मस्जिद बन चूका थासेंत सुफिया का नाम आया सुफिया हो गया थाउसकी ये नयी जिंदगी भी सैकड़ो वर्षो की निकली
उन्नीसवी सदी में तुर्की साम्राज्य एक बार फिर कमज़ोर पड़ने लगा और रूस कुस्तुन्तुनिया के तरफ लालच भरी आँखों से देखता था । रूस के जार अपने को पूर्वी रोमन सम्राटों के वारिस समझते थे और उनकी पुरानी राजधानी कब्ज़े में लेना चाहते थे। रूस को ये असह्य था की उसके धर्म का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित गिरजा घर, मस्जिद बनी रहे।
धीरे धीरे जारो का रूस, कुस्तुन्तुनिया की और बढ़ता गया, लेकिन उनके ये मंसीबे पूरे नहीं हुए । उससे पहले जारो का रूस ही ख़त्म हो गया। वह क्रांति हुई, हुकूमत और समाज दोनों में उलटफेर हो गया। बोल्शेविको ने घोषणा की, की वो साम्राज्यवाद के विरुद्ध है औए किसी दुसरे देश पर अधीकार नहीं चाहते है । हरेक जाती को स्वतंत्र रहने का अधिकार है।
लेकिन अंग्रेजो ने कुस्तुन्तुनिया पर कब्ज़ा किया और ४८६ वर्षो के बाद एक बार फिर हुकूमत इसाई हाथो में थी। सुलतान खलीफा ज़रूर थे लेकिन कठपुतली की भाँती, आया सुफिया भी हस्बमामूल कड़ी थी पर अब उसकी वो शान कहाँ जो आज़ाद वक़्त में थी। सुलतान से सर झुकाया, लेकिन चाँद तुर्क ऐसे थे जिन्हें गुलामी कबूल नहीं थी जिनमे से एक थे मुस्तफा कमाल और उन्होंने बगावत की बिगुल फूँक डाली।मुस्तफा कमाल पाशा ने ग्रीक फौज़ों को हरा कर बाहर खदेड़ दिया और सुलतान को भी गद्दार कहकर निकाल दिया। पुरानी राजधानी कुस्तुन्तुनिया का नाम बदल दिया गया और अब वो इस्ताम्बुल हो गया और आया सुफिया उसका क्या हुआ चौदह सौ वर्ष की इमारत इस्ताम्बुल में खड़ी है और जिंदगी की ऊंच नीच देखती जाती है । नौ सौ वर्षो तक उसने ग्रीक के धार्मिक गाने और अनेक सुगंधियों को सूंघा । फिर ४८० वर्षो तक अरबी आवाज़ की अजान उसकी कानो में पड़ी। और अब ?
एक दिन कुछ महीनो की बात है इसी साल १९३५ में ग़ाज़ी मुस्तफा कमाल पाशा के हुक्म से आया सुफिया मस्जिद नहीं रही । बगैर किसी धूम-धाम के वहाँ के मुल्ला मौलबी अन्य मस्जिदों में भेज दिए गए और तय किया गया की सुफिया मस्जिद नहीं संग्रहालय होगी खासकर बैजेंताइन कला का। ये कला इसाई के ज़माने का था तो सुफिया एक बार फिर से इसाई ज़माने को वापस चली गयी।

लेकिन वो पत्थर वो दीवारे खामोश है । उन्होंने इतावर की इसाई पूजा बहुत देखी और बहुत देखी जुमे की नमाज़। अब हर दिन की नुमाइश है उनके साए में । दुनिया बदलती रही लेकिन वे कायम है । उनके घिसे हुए चेहरे पर कुछ हलकी सी मुस्कराहट मालूम होती है और कानो में धीमी सी आवाज़ आती है -"इंसान भी कितना बेवकूफ और जाहिल है की हजारो वर्षों के तजुर्बे से नहीं सीखता और बार-बार वही हिमाकतें करता है"

फरवरी १९३५ में लिखा गया नेहरु जी का ये लेख लाहौर शहीद्गंज गुरुद्वारा बनाम मस्जिद के विवाद पर केन्द्रित था। जो आज भी जीवंत लगता है।
धन्यवाद...

2 comments:

पुनीत पाठक said...

बहुत बढ़िया..काश ये लेख वो लोग भी पढ़ पाते जिनकी वजह से मामले ख़ूनी रंग लेते हैं...बरसों लगते हैं पर सुलझ नहीं पाते...पर हमारी जानकारी के लिए भी बहुत ही बढिया है...धन्यवाद इसे हम तक पहुंचाने के लिेए....

Charan Community of india said...

very nice
aapka lekh bahoot acha hai